दोषपूर्ण कृषि नीति व गलत आयात-निर्यात नीतियों के कारण आत्म हत्या करते किसान
भारत एक कृषि प्रधान देष है। और देष की 70 प्रतिषत जनसंख्या सीधे या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर करती है। परन्तु दोषपूर्ण कृषि नीति व गलत आयात-निर्यात की नीति के कारण देष में किसान आत्महत्या कर रहे है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की एक रिपोर्ट के अनुसार विदर्भ में बड़े पैमाने पर किसानों द्वारा आत्महत्या का कारण पाष्चात देषों का अनुकरण करके वीटी काटन की खेती को प्रोत्साहन देने की गलत नीति रही जो देष में किसानों के हित के लिये आत्मघाती साबित हुई।
विदर्भ जन आन्दोलन समिति की रिपोर्ट के अनुसार विदर्भ के छः जिलांे में वर्ष 2011 के दौरान680 किसानों ने आत्महत्या की। इसी प्रकार आन्ध्र प्रदेष के छः जिलों में अक्टूबर व नवम्बर 2011 में दो माह की अवधि में 90 किसानों ने आत्महत्या की।
जहां बुन्देल खण्ड में पिछले तीन वर्षों में 1400 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की, वहीं वर्ष 2006 में महाराष्ट्र में 4453 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की जो पूरे देष की उसी वर्ष में घटित आत्महत्या की घटनाओं की संख्या 17060 के एक चैथाई से भी अधिक है। इसी प्रकार कर्नाटक व आन्ध्रप्रदेष में वर्ष 2005-06 के दौरान 1003 व 1313 लोगों ने आत्म हत्यों की।
नेषनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2009 के दौरान देष में कुल 17368 किसानों ने आत्म हत्या की।
देष में किसानों की आत्महत्या का सिलसिला 16 वर्ष पूर्व यानि 1995 मेें वैष्वीकरण युग के पष्चात प्रारम्भ हुआ। क्योंकि कृषिनीति में आमूल चूल परिवर्तन किये गये। कृषि में ग्लोवलाइजेषन एवं जीएमआ ळमदमजपबंससल उवकपपिमक वतहंदपेउ को अपनाया गया। तदनुसार भारत में किसानों को उनके उत्पादक का मूल्य उनकी वास्तविक कीमत से कम मिलने लगा। जीएमक्राप का प्रचलन बढ़ा जिससे किसान ऋण के जाल ;क्मइपज ज्तंचद्ध में बिना किसी लाभ के फंसते चले गये जिसकी परिणति किसानों द्वारा आत्महत्या के रूप में हुई।
पूर्व में उपजाये जाने वाली खाद्य वस्तुओं के स्थान पर नकदी फसलों का सिस्टम अपनाया गया। लाखों किसान अपने परम्परागत उत्पादों को छोड़कर नकदी फसलों जैसे वीटी काटन की पैदावार में लग गये पर इसके कारण उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ और इसके परिणाम स्वरूप वे दिवलिया होते चले गये संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की तरह भारत में भी ये दावा किया गया कि जीएमओ फसले कृषि उत्पादन को बढ़ायेगी परन्तु सारे दावे खोखले साबित हुये।
विदर्भ में इतने बड़े पैमाने पर आत्महत्या का कारण कपास के न्यूनतम सपोर्ट प्राइस में गिरावट के कारण हुआ, विष्व व्यापार संगठन ;ॅज्व्द्ध की गलत नीति और विकसित देषों द्वारा अपने कपास उत्पादनों को बड़े पैमाने पर सब्सिडी दिये जाने के कारण विष्व बाजार में विदर्भ में पैदा होने वाली कपास प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गयी जिसके कारण विदर्भ के किसानों के आत्म हत्याओं में वृद्धि हुई और विद्यालयों में ड्राप आउटस के मामलां में वृद्धि हुई है। आर्थिक बदहाली में विधवायें संघर्ष कर रही हैं तथा ऋण का बोझ उनके सिर पर ज्यों का त्यों है और उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
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