भ्रष्टाचार व घोटालों का वर्ष -2010
मैं अपने चार दषक से अधिक के राजनैतिक जीवन में कभी भी इतना संषय में नहीं रहा कि देष के अािर्थक विकास पर खुष होऊ या देष में बढ़ते भ्रष्टाचार व घोटालों पर दुखी होंऊ। एक ओर देष के वित्त मंत्री लगातार यह दावा करते हैं कि षीघ्र ही हम आर्थिक विकास की दर को दहाई अंकों तक ले जाने में सफल होंगे। वहीं दूसरी ओर हमारे प्रधानमंत्री यह कहते हैं कि भ्रष्टाचार से निपटने में नाकामी गठबन्धन सरकार की मजबूरी है। वर्ष 2010 भ्रष्टाचार व घोटालों के वर्ष के रूप में जाना जायेगा।
2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला, आदर्ष सोषायटी घोटाला, इष्योरंेस घोटाला, कामनवेल्थ गेम्स घोटाला, बोफोर्स मामले में आयकर ट्रिब्यून की टिप्पणी, विदेषों में काले धन का मामला पूरे वर्ष सुर्खियों में रहे। यह पहला अवसर है जब सर्वोच्च न्यायालय की पहल के कारण सरकार का एक पूर्व मंत्री जेल में है, कामनवेल्थ आयोजन समिति के बड़े अधिकारी जेल में है और आदर्ष सोषायटी घोटाले में एक पूर्व मुख्य मंत्री आरोपित है।
सरकार में भ्रष्टाचार समाप्त करने लिये भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम बनाया गया। मुख्य सतर्कता आयोग और केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो की स्थापना की गयी। परन्तु ये संस्थायें एक ही अलिखित कानून का पालन करती हैं कि ‘‘ किसी बड़े नाम को आंच नहीं आनी चाहिये, अगर जांच उस तक पहुंचती है तो रास्ता बदल दो‘‘ कमोवेष यही स्थिति राज्य पुलिस व अन्य जांच एजेन्सियों में भी है।
2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले देष को लगभग 1.76 लाख करोड़ रूपये की क्षति उठानी पड़ी और तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा के विरूद्ध कार्यवाही की फाइल अनुमोदन हेतु 11 महीने तक प्रधानमंत्री कार्यालय में लम्बित पड़ी रही, सर्वोच्च न्यायालय के दखल के पष्चात ही जांच आगे बढ़ी, ए. राजा आज जेल में हैं परन्तु इस खेल के पीछे किस महाराजा का हाथ है पूरा देष जानना चाहता है। अन्यथा इस मामले में भी राजा को जमानत मिल जायेगी और सीबीआइ या तो उसमें क्लोजर रिपोर्ट फाइल करेगी या फाइल सीबीआइ कार्यालय मे धूल चाटती रह जायेगी।
भारत सरकार के गृह सचिव ने एक समारोह में यह माना देष में कान्सटेबल व दरोगा की भर्ती बगैर पैसा दिये नहीं हो सकती। एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेष में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी सरकार में पुलिस में सिपाहियों की हजारों पदों में भर्तिया पैसा लेकर हुई। कुछ उच्च अधिकारी निलम्बित हुये पर इस मामले में सर्तकता आयोग व सीबीआइ मूकदर्षक बने रहे। हां सीबीआइ की कभी कभार किसी क्लर्क या चपरासी की भर्ती में सोर्स इंफारमेषन के जरिये क्रियाषील अवष्य हो जाती है।
सीबीआइ के विषय में एक विष्वास था कि देष में भ्रष्ट और घोटालेबाज सीबीआइ की गिरफ्त से नहीं बच सकते, उसके अफसर निष्ठावान, ईमानदार व निष्पक्ष होते हैं और राजनीतिक नेतृत्व उसके काम में दखल नहीं दे सकता। परन्तु अब लोगों का भरोसा सीबीआइ से उठने लगा है क्योंकि अब सीबीआइ और सीवीसी हर कदम पर नार्थ ब्लाक ओर साउथ ब्लाक में बैठे आकाओं से दिषा निर्देष लेती है। षुरूआती दौर में सक्सेस प्रतिषत षत प्रतिषत रखने वाली सीबीआइ की नाकामिया उसके कामयाबी से बेहतर है। पिछले पांच वर्षांे में क्लोजर रिपोर्ट व दोषसिद्ध के मामले का विवरण से यह स्पष्ट हैः- वर्ष दोषसिद्ध क्लोजर रिपोर्ट 2005 341 91 2006 436 77 2007 426 99 2008 382 83 2009 435 93 ( नोटः सीबीआइ के पूर्व संयुक्त निदेषक आर वी लाल की किताब से उद्धत)
आज यह अक्सर कहा जाता है कि सीबीआइ बड़े बाबुओं की एजेन्सी है जो उन्हें जेल जाने से बचाती है और यह गठबन्धन युग में सरकार की सत्ता बचाने का एक उपक्रम है। इसी कारण मुलायम सिंह यादव व मायावती के खिलाफ दर्ज मामले सरकार की सहूलियत के हिसाब से चलते हैं। जब सरकार को उसके समर्थन की आवष्यकता होती है तो मामले ठंडे बस्ते में डाल दिये जाते हैं और जब सरकार नहीं चाहती है तो वे षुरू हो जाते हैं।
विदेषों में जमा कालाधन देष की अर्थव्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहा है। सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल एक याचिका के अनुसार इस समय विभिन्न भारतीयों का लगभग 73 लाख करोड़ रूपये स्वीस बैंक में जमा हैं। आईएमएफ के अनुसार स्वीटजरलैण्ड, चीन, ताइवान, तेल निर्यातक देषों को छोड़कर, ग्लोबल ब्लैक मनी डालर 18 खरब पहुचं चुका है। हमारे वित्त मंत्री ने स्वयं स्वीकार किया कि देष का विदेषों में जमा काला धन 500 खरब डालर से 1400 खरब डालर के बीच है।
हाल ही में जर्मनी की सरकार से जर्मनी के लिचंटेषन बैंक में जमा कालेधन के खाता धारकों के विषय में सूचना भेजी और सरकार ने इस बात को स्वीकार भी किया परन्तु इन खातेदारों का नाम उजागर न करके भारत सरकार कालाधन जमा करने की प्रवृत्ति को अपरोक्ष रूप से बढ़ावा दे रही है।
वर्तमान में स्विटजरलैण्ड जमाखारों के लिये टेक्स हैवन के रूप में जाना जाता है। सरकार को स्विटजरलैण्ड सरकार पर दबाव बनाना चाहिये जिससे स्विसबैक में जमा कालेधन को देष में वापस लाया जा सके। परन्तु लगता है कि भारत सरकार काले धन की समस्या के प्रति गंभीर नहीं है। देष में 40 करोड़ से ऊपर जनता गरीबी रेखा से नीचे रह रही है। और हमारे देष का कालाधन विदेषों में जमा पड़ा है। सरकार को कालेधन को टैक्स चोरी का मामला मानने के बजाय, मानवता के प्रति अपराध की संज्ञा देनी चाहिए।
पूर्व रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या 1975 में हुई सीबीआइ उनके हत्यारे नहीं पकड़ सकी। इसी प्रकार पूर्व पेट्रोलियम मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के 15 मामले दर्ज थे परन्तु यूपीए ने 27 सितम्बर, 2004 को उन पर मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया परिणाम स्वरूप सीबीआइ को स्पेषल अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करनी पड़ी।
पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव की सरकार को बचाने हेतु झारखण्ड मुक्तिमोर्चा के सांसदों की खरीद फरोक्त हुई परन्तु दुर्भाग्यवष सीबीआइ ने इस केष को बन्द कर दिया। इसी प्रकार कांग्रेस अध्यक्षा जी के निजी सचिव रहे वी. जार्ज के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति का मामला 10 वर्ष पूर्व दर्ज हुआ इस केष का क्या हुआ कोई नहीं जानता।
इसी प्रकार छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री विधायकों की खरीद फरोक्त के जरिये छत्तीसगढ में लोकतंत्र का गला घोटने का प्रयास किया विधायक द्वारा सबूत पेष किये जाने के बावजूद इस मामले में सीबीआइ ने चार्जषीट नहीं फाइल की। वर्ष 2008 में आये अवष्विास प्रस्ताव पर सरकार को बचाने हेतु दल विषेष के सांसदों को रिष्वत देने के वीकलीक्स का खुलासा भारतीय लोकतंत्र पर बहुत बड़ा आघात है। बहुत आष्चर्य की बात यह है कि हमारी भ्रष्टाचार विरोधक एजेन्सियों को इस काण्ड का पता नहीं लगा था या पता लगाने का प्रयास नहीं किया गया।
ऐसे कितने ही मामले हैं जो देष की सबसे बड़ी व विष्वसनीय जांच ऐजेन्सी की निष्पक्षता पर प्रष्न चिन्ह लगा रहे हैं। सीबीआइ के पूर्व संयुक्त निदेषक श्री आर.बी. लाल के अनुसार आम मामलों में सीबीआइ का प्रदर्षन षत प्रतिषत है जबकि हाई प्रोफाइल मामलों में इसका प्रभाव षून्य है।
अभी हाल में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार के मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति रद्द कर दी गई है। प्रधान मंत्री, गृहमंत्री व विपक्ष की नेता की समिति ने नेता विपक्ष की आपत्ति के बावजूद ऐसे व्यक्ति को सतर्कता आयुक्त नियुक्त कर दिया जो भ्रष्टाचार के प्रति दोहरी नीति को दर्षाता है।
यदि हम वास्तव में देष से भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिये कटिबद्ध है तो सीबीसी जैसे संवैधानिक पदों पर नियुक्ति में पूरी पारदर्षिता आवष्यक है। करप्षन से निपटने के दोहरे मापदण्ड बन्द किये जाने चाहिये। सीबीआइ सहित अन्य जांच एजेन्सियों को स्वायत्त संस्था के रूप में काम करने दिया जाना चाहिये, जिससे उन्हें भ्रष्टाचार के मामलों में सरकार से दिषा निर्देष न लेना पड़े। सरकार को सीबीआइ सहित तमाम एजेन्सियों से कोसों दूर रहना चाहिये। करप्षन रेगुलेटरी एथारिटी का निर्माण किया जाना चाहिये।
यहां पर मैं प्राचीन चाणकय नीति का उल्लेख करना चाहूंगा जिसके अनुसार अभियोगी और अपराधी को उन सभी लाभों से वंचित कर दिया जाना चाहिये जो उसने भ्रष्टाचार के माध्यम से अर्जित किया है। छापे पड़ते हैं तो कचहरियों, नगरपालिकाओं के बाबू भी करोड़पति पाये जाते हैं जूनियर इन्जीनियर की कोठी पायी जाती है। इनको इन सम्पत्तियों से बेदखल करके समाज सेवा में लगा दिया जाना चाहिये। जैसा कि बिहार में नितिष कुमार ने एक भ्रष्ट अधिकारी की कोठी जब्त करके उसमें स्कूल खोल दिया।
यदि भारत सरकार भी इसी प्रकार निष्पक्ष होकर कदम उठायेगी तो हमारे प्रधानमंत्री को यह नहीं कहना पड़ेगा कि भ्रष्टाचार गठबन्धन की मजबूरी है। और देष का हर नागरिक इस संषय में नहीं जियेगा कि वह देष की आर्थिक प्रगति पर प्रसन्न हो या बढ़ते भ्रष्टाचार व घोटालों पर आंसू बहाये।
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