शिक्षक दिवस: डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती और गुरु-स्तुति की परंपरा
5 सितंबर को मनाया जाने वाला शिक्षक दिवस डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती का दिन है। सितंबर 2014 में कलराज मिश्र ने इस अवसर पर राष्ट्र को शुभकामनाएं देते हुए राधाकृष्णन को श्रद्धांजलि दी थी और गुरु-स्तुति का प्रसिद्ध श्लोक उद्धृत किया था — 'अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्...'। संग्रह के उस संदेश के संदर्भ में यह लेख शिक्षक दिवस और गुरु-शिष्य परंपरा पर है।
राधाकृष्णन: अध्यापक से राष्ट्रपति तक
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुतनि में हुआ था। दार्शनिक, लेखक और प्राध्यापक — वे ऑक्सफोर्ड में पूर्वी धर्मों के प्राध्यापक, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत के पहले उपराष्ट्रपति (1952) और दूसरे राष्ट्रपति (1962) रहे। 1962 में जब उनके विद्यार्थियों ने जन्मदिन मनाने की इच्छा जताई, तो उन्होंने कहा — इसे मेरे जन्मदिन के रूप में नहीं, शिक्षक दिवस के रूप में मनाओ। तभी से 5 सितंबर शिक्षक दिवस है।
गुरु-शिष्य परंपरा का मूल भाव
- गुरु को ज्ञान का द्वार मानना — 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः' की परंपरा
- शिक्षा को व्यवसाय से पहले दायित्व समझना — निःस्वार्थ प्रसार
- शिष्य की चरित्र-निर्माण में शिक्षक की छवि — व्यवहार से सिखाना
आधुनिक भारत में शिक्षक की स्थिति
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षक-शिक्षा (NCTE के एकीकृत ITEP कार्यक्रम) और शिक्षकों के निरंतर प्रशिक्षण पर नया जोर दिया। दूसरी ओर ग्रामीण विद्यालयों में अतिथि/अनुबंध शिक्षकों की बढ़ती संख्या, नॉन-टीचिंग काम का बोझ और रिक्तियां — ये चुनौतियां बनी हुई हैं। शिक्षक दिवस पर श्रद्धांजलि तब सार्थक है जब कक्षा की ये वास्तविकताएं भी नजर में रहें।
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1888 | डॉ. राधाकृष्णन का जन्म, तिरुतनि |
| 1952 | भारत के पहले उपराष्ट्रपति |
| 1962 | दूसरे राष्ट्रपति; शिक्षक दिवस परंपरा की शुरुआत |
| 1975 | निधन — भारत रत्न से सम्मानित |
शुभकामना से आगे
2014 के उस संदेश में उद्धृत श्लोक गुरु को विश्व-व्यापी ज्ञान का प्रतीक कहता है। 2026 में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऑनलाइन पाठ्यक्रम शिक्षा बदल रहे हैं, शिक्षक की भूमिका जानकारी देने वाले से मार्गदर्शक की ओर और बढ़ रही है। शिक्षक दिवस इसी मार्गदर्शन के सम्मान का दिन है — आज भी, और आगे भी।