गांधी 150: पदयात्रा की परंपरा और देवरिया का कार्यक्रम
अक्टूबर 2018 से अक्टूबर 2020 तक देश ने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनाई। इस दौरान देवरिया समेत सैकड़ों जिलों में पदयात्राएं निकलीं — जनवरी 2019 में देवरिया में भी इसी अवसर पर पदयात्रा और जनसंपर्क कार्यक्रम हुआ था। संग्रह के उस कार्यक्रम के संदर्भ में यह लेख गांधी पदयात्रा की परंपरा और उसके नैतिक-राजनीतिक अर्थ पर है।
दांडी से देवरिया तक
गांधी और पदयात्रा का रिश्ता 12 मार्च 1930 को शुरू हुई दांडी यात्रा से जुड़ा है — 78 अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम से 24 दिन और लगभग 385 किलोमीटर का पैदल सफर, जिसने नमक कानून के विरुद्ध सविनय अवज्ञा को जनांदोलन बना दिया। पदयात्रा गांधी के लिए सिर्फ प्रतीक नहीं थी; यह धरातल से संवाद की पद्धति थी — गांव-गांव रुकना, चरखा कातना, लोगों की बात सुनना।
150वीं जयंती का दायरा
150वीं जयंती समारोहों में सरकारी और स्वयंसेवी संस्थाओं ने कई तरह के कार्यक्रम किए:
- 2 अक्टूबर को पदयात्राएं, प्रभात फेरियां और सर्वधर्म प्रार्थना सभाएं
- स्वच्छ भारत अभियान से जोड़कर सफाई श्रमदान
- खादी प्रदर्शनियां — 'खादी से राष्ट्र निर्माण' का संदेश
- विद्यालयों में गांधी-जीवन पर निबंध, चित्रकला और नाटक
पदयात्रा का राजनीतिक व्याकरण
भारतीय राजनीति में पदयात्रा समय-समय पर लौटती रही है — चाहे 1983 में चंडीगढ़ से दिल्ली की यात्रा हो या हाल के वर्षों में भारत जोड़ो यात्रा। गांधीवादी ढांचे में पदयात्रा का मतलब सत्ता प्रदर्शन नहीं, तप और संपर्क है; आधुनिक चुनावी रैलियों में वह नैतिक भाव कमजोर हुआ है, पर प्रारूप जीवित है।
| यात्रा | वर्ष | संदेश |
|---|---|---|
| दांडी मार्च | 1930 | सविनय अवज्ञा; नमक सत्याग्रह |
| गांधी 150 पदयात्राएं | 2018–2020 | स्वच्छता, खादी, अहिंसा |
| भारत जोड़ो यात्रा | 2022–23 | कन्याकुमारी से कश्मीर; संपर्क अभियान |
स्मरण का सही ढंग
गांधी की जयंती पर पदयात्रा तब सार्थक होती है, जब उसका अंत किसी ठोस काम में ढलता हो — किसी तालाब की सफाई, किसी विद्यालय का पुस्तकालय, किसी खादी हाथठग्गे का ऑर्डर। देवरिया की 2019 की पदयात्रा भी उसी परंपरा की कड़ी थी। 2026 में, 156वीं जयंती की ओर बढ़ते हुए, गांधी को याद करने का सबसे गांधीवादी तरीका वही है — पैदल चलना और काम करना।