देवरिया · लखनऊ · जयपुर — अभिलेखागार 2012–2021

देवरिया में स्मार्ट क्लासरूम: ग्रामीण शिक्षा में डिजिटल पहुंच

देवरिया · कलराज मिश्र · 2026

जनवरी 2019 में देवरिया के कृषक इंटर कॉलेज विशुनपुरकला में 'स्मार्ट क्लासरूम' का लोकार्पण हुआ था। संग्रह की इस खबर के संदर्भ में यह लेख ग्रामीण विद्यालयों में डिजिटल शिक्षा की पहुंच, उसके फायदे और उसकी सीमाओं पर है।

स्मार्ट क्लासरूम का मतलब

स्मार्ट क्लासरूम का सामान्य अर्थ है — प्रोजेक्टर या इंटरैक्टिव पैनल, शिक्षक का लैपटॉप/टैबलेट, डिजिटल पाठ्यसामग्री और जहां संभव हो इंटरनेट। उत्तर प्रदेश में ऑपरेशन कायाकल्प और विभिन्न सीएसआर/सांसद निधि से हजारों विद्यालयों में ऐसे कक्ष बने। कृषक इंटर कॉलेज जैसे संस्थानों में यह सुविधा किसान परिवारों के बच्चों तक सीधे पहुंचती है।

डिजिटल कक्ष से क्या बदलता है

  • विज्ञान के प्रयोग और ज्यामिति की आकृतियां स्क्रीन पर घूमती हैं — अमूर्त अवधारणा ठोस बनती है
  • एक ही अच्छा व्याख्यान कई कक्षाओं में दिखाया जा सकता है — शिक्षक-घाटे की भरपाई
  • डिक्षा (DIKSHA) और पीएम ई-विद्या जैसे मंचों से एनसीईआरटी की सामग्री मुफ्त मिलती है
  • ऑनलाइन मूल्यांकन और त्वरित प्रश्नोत्तरी से शिक्षक को तुरंत प्रतिक्रिया

धरातल की चुनौतियाँ

स्मार्ट क्लास का सच यह भी है कि कई विद्यालयों में प्रोजेक्टर धूल खाता है — बिजली की कटौती, खराब लैम्प, प्रशिक्षित शिक्षक का अभाव और रखरखाव के बजट की कमी प्रमुख कारण हैं। कोविड के बाद इसकी अहमियत और बढ़ी, क्योंकि बंद विद्यालयों ने दिखा दिया कि डिजिटल पहुंच अब विकल्प नहीं, आधार है।

घटकएक बार की लागत (अनुमानित)चुनौती
प्रोजेक्टर/पैनल + स्क्रीन40 हज़ार – 1.5 लाख रु.लैम्प/पैनल का रखरखाव
कंप्यूटर/टैबलेट20–60 हज़ार रु.सॉफ्टवेयर अपडेट, चोरी-सुरक्षा
इंटरनेटवार्षिक सदस्यताग्रामीण क्षेत्र में बैंडविड्थ
शिक्षक प्रशिक्षणसतत प्रक्रियास्थानांतरण से प्रशिक्षित शिक्षक का जाना

विशुनपुरकला से 2026 तक

जिस कक्ष की शुरुआत 2019 में हुई थी, उसी दिशा में आज उत्तर प्रदेश के विद्यालय स्मार्ट क्लास और टैबलेट योजना से जुड़ रहे हैं। तकनीक सिर्फ औजार है — असली स्मार्टनेस उस शिक्षक की है, जो स्क्रीन के सामने भी ब्लैकबोर्ड जैसी सरलता से समझा सके। देवरिया के गांव के बच्चों के लिए यह कक्ष उसी कोशिश की शुरुआत थी।