देवरिया · लखनऊ · जयपुर — अभिलेखागार 2012–2021

देवरिया का कवि सम्मेलन और हिंदी साहित्य की मंच परंपरा

देवरिया · कलराज मिश्र · 2026

जनवरी 2019 में देवरिया में हिंदुस्तान समाचार पत्र के कवि सम्मेलन का दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारंभ हुआ था — कवियों और कवयित्रियों को सम्मानित किया गया। संग्रह के इस संदर्भ से यह लेख हिंदी कवि सम्मेलन की सांस्कृतिक परंपरा और उसके बदलते स्वरूप पर है।

मंच की लोकतांत्रिक कला

कवि सम्मेलन हिंदी भाषा की सबसे लोकप्रिय साहित्यिक संस्थाओं में है — इसमें कोई टिकट-घर नहीं, कोई जातिगत द्वार नहीं। मंच पर हास्य, वीर रस, श्रृंगार और समसामयिक व्यंग्य एक ही शाम में उतरते हैं। देवरिया जैसे जिलों में अखबार और सामाजिक संस्थाओं द्वारा आयोजित सम्मेलन साल के प्रमुख सांस्कृतिक आयोजन रहे हैं — यह परंपरा 2019 के उस कार्यक्रम में भी दिखी।

परंपरा की प्रमुख धाराएं

  • हास्य-व्यंग्य — हुल्लड़ मुरादाबादी से लेकर वर्तमान हास्य कवियों तक की धारा
  • वीर रस और राष्ट्रीय भावना — 'पुष्प की अभिलाषा' से मांगलेश डबराल तक का राष्ट्रीय स्वर
  • स्त्री काव्य और समकालीन आवाजें — कवयित्रियों की बढ़ती मौजूदगी
  • भोजपुरी और अवधी की लोक-धारा — पूर्वांचल के मंचों की अपनी मिट्टी

दीप प्रज्ज्वलन का अर्थ

दीप जलाकर शुरुआत करना कवि सम्मेलन की औपचारिक क्रिया है — प्रकाश के प्रतीक से ज्ञान और वाणी का आह्वान। सम्मान समारोह इसमें जुड़ता है — क्षेत्र के साहित्यकारों को शॉल-श्रीफल से नवाजना, जिससे स्थानीय साहित्य को मंच की मान्यता मिलती है।

माध्यमदायराविशेषता
शहरी कवि सम्मेलनहजारों श्रोता, सजातीय शामपरंपरागत मंच
टीवी/यूट्यूब कवितालाखों दर्शकक्लिप संस्कृति, त्वरित प्रसिद्धि
साहित्यिक गोष्ठीसीमित, गंभीर पाठकपाठ और चर्चा केंद्रित

2026 में कविता की हालत

डिजिटल मंचों ने कविता को नई भीड़ दी है — एक कविता का क्लिप रातोंरत करोड़ों तक पहुंचता है। पर कवि सम्मेलन की असली परीक्षा अब भी वही है — श्रोता के सामने बिना संपादन के कविता सुनाना। देवरिया का 2019 वाला मंच इसी जीवंत परीक्षा की कड़ी था, और यह परंपरा आज भी पूर्वांचल की सांस्कृतिक पहचान है।