महावीर भगोरा: आदिवासी अंचल से आए नेता का योगदान
जनवरी 2021 में राजस्थान के सालुम्बर क्षेत्र के पूर्व सांसद महावीर भगोरा का निधन हो गया। आदिवासी अंचल से आए इस नेता के निधन पर तत्कालीन राज्यपाल कलराज मिश्र ने शोक संवेदना दर्ज कराई थी। संग्रह का यह पृष्ठ उनके जीवन और राजस्थान की आदिवासी राजनीति में उनके स्थान पर एक टिप्पणी है।
सालुम्बर से संसद तक
महावीर भगोरा राजस्थान के उदयपुर संभाग के सालुम्बर क्षेत्र से आते थे — यह इलाका राज्य के प्रमुख आदिवासी बहुल संसदीय क्षेत्रों में है। भील समुदाय से आए भगोरा ने पहली बार 2004 में सालुम्बर (अनुसूचित जनजाति) सीट से लोकसभा का चुनाव जीता। भाजपा के लिए दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी इलाकों में उनकी जीत उस दौर की उल्लेखनीय घटना थी।
आदिवासी क्षेत्रों के मुद्दे
सालुम्बर-उदयपुर-बांसवाड़ा की पट्टी में जिन सवालों को भगोरा बार-बार उठाते रहे, वे आज भी वैसे ही हैं:
- जनजातीय क्षेत्रों में सिंचाई, सड़क और स्वास्थ्य केंद्रों की दूरी
- वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत सामुदायिक दावों की धीमी प्रक्रिया
- प्रवासी श्रम — आदिवासी परिवारों का गुजरात के कपास और निर्माण क्षेत्र में पलायन
- शिक्षा में अश्रम विद्यालयों और छात्रावासों की व्यवस्था
राजनीति में प्रतिनिधित्व का मतलब
आदिवासी क्षेत्रों से निर्वाचित नेताओं की भूमिका दोहरी होती है — वे अपने समुदाय की आवाज विधायी मंच तक पहुंचाते हैं और साथ ही केंद्र व राज्य की योजनाओं का अनुवाद स्थानीय भाषा और परिस्थिति में करते हैं। भगोरा का जीवन इसी सेतु-भूमिका में बीता।
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 2004 | सालुम्बर से लोकसभा सांसद निर्वाचित |
| 2004–2009 | चौदहवीं लोकसभा में आदिवासी क्षेत्रों के मुद्दे उठाए |
| जनवरी 2021 | निधन; राज्यभर में शोक |
एक पीढ़ी का हिसाब
महावीर भगोरा जैसे नेता क्षेत्रीय राजनीति की वह पीढ़ी हैं, जो पार्टी प्रतिनिधित्व से पहले समुदाय प्रतिनिधित्व से उभरी। उनके निधन पर राजभवन से आया शोक संदेश उसी वजह से स्वाभाविक था — क्योंकि आदिवासी अंचल की आवाज संस्थागत सम्मान की हकदार है। 2026 में भी सालुम्बर की राजनीति में उनके नाम का स्मरण जीवित है।