महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ: स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ा संस्थान
वाराणसी की गली-कूचों में शिक्षा का एक ऐसा संस्थान बसा है, जिसकी नींव स्वयं स्वाधीनता आंदोलन की आंधी में रखी गई थी — महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ। नवंबर 2015 में कलराज मिश्र ने इस संस्थान के तत्कालीन कुलपति से भेंट की थी; संग्रह के उस संदर्भ को आधार बनाकर यह लेख विद्यापीठ के सौ वर्षों की कहानी कहता है।
असहयोग आंदोलन की औलाद
1920-21 का असहयोग आंदोलन जब छात्रों को सरकारी कॉलेज छोड़ने का आह्वान कर रहा था, तब राष्ट्रीय शिक्षा के वैकल्पिक संस्थानों की जरूरत उठी। इसी लहर में 10 फरवरी 1921 को काशी विद्यापीठ की स्थापना हुई — बाबू शिव प्रसाद गुप्त की धन-दान और भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय और डॉ. भगवान दास जैसे शिक्षाविदों के समर्थन से। महात्मा गांधी ने स्वयं इसकी शुभकामना और मार्गदर्शन दिया था; बाद में संस्थान का नाम उनके नाम पर रखा गया।
क्या थी इसकी खासियत
- राष्ट्रीय शिक्षा — अंग्रेजी सरकार की पाठ्य-पद्धति से हटकर स्वदेशी पाठ्यक्रम
- गांधीवादी अध्ययन, अहिंसा और सत्याग्रह के प्रश्नों का शैक्षणिक केंद्र
- हिंदी माध्यम और ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए खुले द्वार
- महिला शिक्षा और अनुसूचित वर्गों के प्रति खुली नीति — उस दौर में अग्रणी
आजादी के बाद का दौर
विद्यापीठ 1972 में उत्तर प्रदेश का राज्य विश्वविद्यालय बना। दशकों से यहां राजनीति विज्ञान, गांधी अध्ययन, पत्रकारिता और समाजशास्त्र के पठन-पाठन की परंपरा है। वाराणसी के जिस क्षेत्र में यह बसा है, उसका इतिहास प्रेमचंद, रामप्रसाद बिस्मिल और काशी की विद्वत्परंपरा से जुड़ा है।
| वर्ष | मोड़ |
|---|---|
| 1921 | काशी विद्यापीठ की स्थापना — असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि |
| 1921–47 | राष्ट्रीय शिक्षा का केंद्र; स्वतंत्रता सेनानियों की उपज |
| 1972 | राज्य विश्वविद्यालय का दर्जा |
| 1995 | नाम में 'महात्मा गांधी' जुड़ा — MGKVP |
| 2021 | स्थापना के शताब्दी वर्ष का समारोह |
विरासत और वर्तमान
एक शताब्दी बाद भी विद्यापीठ का महत्व सिर्फ भावनात्मक नहीं है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के दौर में, जब भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा और स्वदेशी ज्ञान परंपरा पर बहस छिड़ी है, काशी विद्यापीठ का प्रयोग फिर प्रासंगिक होता है — शिक्षा का देशीकरण कैसा दिखता है, इसका जीवित नमूना। कुलपति से 2015 की वह भेंट भी इसी संस्थागत सम्मान की कड़ी थी।