Tuesday , 11 August 2020

इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय का 133वां स्थापना दिवस समारोह

इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के 133वें स्थापना दिवस समारोह में सम्मलित हुआ।
कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा:

इस विश्वविद्यालय की स्थापना 1887 में हुई थी। आज उसके 133वाॅ स्थापना दिवस के अवसर पर आपने मुझे बुलाया यह मेरे लिए परम प्रसन्नता का विषय है क्योंकि तीर्थों में सर्वोत्तम माने जाने वाले तीर्थराज प्रयाग की पावन धरा क्षण-क्षण ऊर्जा प्रदान करती है। उत्तर वाहिनी पुण्य सलिला गंगा और दक्षिण वाहिनी यमुना के साथ भूतल वाहिनी सरस्वती के संगम पर स्थापित विश्वविद्यालय भारत का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय माना जाता रहा है। यहां भारत के कोने-कोने से तथा विश्व के अन्य देशों के छात्र भी शिक्षा ग्रहण करने आते रहे हैं। इस विश्वविद्यालय को पूर्व का ऑक्सफोर्ड कहा जाता है। यह साहित्य, संस्कृति, इतिहास और विज्ञान की धरती पर बसा है। भरद्वाज आश्रम, अरैल और झूंसी साधकों की चिन्मयी विभूति से मण्डित है। मुगलकालीन दुर्ग में अशोक स्तम्भ भी हमें इतिहास के अतीत में ले जाने को बाध्य करता है। ऐसे पवित्र नगर और ऐसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के छात्रों और यहां सभी आचार्यों को इसकी गरिमा को बनाए रखने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए।

हमें इस बात का गर्व होना चाहिए कि इस विश्वविद्यालय के पुरा छात्रों ने देश की राजनीति, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान इत्यादिक्षेत्रों में देश का नेतृत्व किया है। राजनीति में प्रसिद्ध नामों की लंबी सूंची में पंडित मोतीलाल नेहरु, गोविंद बल्लभ पंत,पूज्य सरसंघ चालक रज्जू भैया राजेंद्र प्रसाद, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, हेमवती नन्दन बहुगुणा, मुरली मनोहर जोशी, केसरीनाथ त्रिपाठी, नारायण दत्त तिवारी आदि के साथ गुलजारी लाल नंदा और पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा भी आते हैं। इस विश्वविद्यालय के पुरा छात्रों में तीन भारत के तथा एक नेपाल के प्रधानमंत्री रहे हैं।

विज्ञान के क्षेत्र में भी यहां के छात्रों ने बड़ा नाम कमाया है। डाॅ0 गौरखप्रसाद गणितज्ञ थे, सर्वप्रथम हिंदी अक्षरों का टाइपराइटर बनाने का श्रेय उन्हें प्राप्त है। ख्याति प्राप्त दूसरे गणितज्ञ हरिश्चंद्र हुए। शिक्षा सुधार हेतु बने कोठारी कमीशन के अध्यक्ष दौलत सिंह कोठारी और प्रेम चंद्र पांडे भी वैज्ञानिक थे। डॉ0 विनोद सिंह जो भोपाल में विज्ञान प्रयोगशाला के अध्यक्ष हैं यहीं के छात्र रहे हैं।

न्यायपालिका में जस्टिस हिदायतुल्लाह, बनवारी लाल यादव और आर0ए0 शर्मा, अजय मिश्र आदि ने अपनीन्याय प्रियता से नाम कमाया है। यह कोई पूर्ण सूची नहीं है केवल इधर हाल के कुछ नाम हैं, जो मेरीस्मृति में आए, उन्हीं का उल्लेख किया है।

साहित्य की धरती प्रयाग के विश्वविद्यालय में धीरेन्द्र वर्मा, महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा, डाॅ0 माता प्रसाद गुप्त, हरिवंश राय बच्चन, रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी, धर्मवीर भारती,भगवतीचरण वर्मा, चंद्रधर शर्मा गुलेरी के साथ दर्शन और शिक्षा के पंडित आचार्य नरेंद्र देव महान विभूतियों में रहे है।यहाँ के आचार्यों में डॉक्टर क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्याय और इतिहास में ईश्वरी प्रसाद का नाम प्रसिद्ध है।

इन सारे नामों की सारणी आपके सामने रखने का मेरा उद्देश्य यह है कि आज के छात्रों को इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए कि ये भी कभी आप लोगों की तरह यहां की कक्षा में बैठकर अध्यापकों के व्याख्यान सुनते और उनके नोट बनाते थे। मैं आपसे यही कहना चाहता हूँ किआगे बढ़ने की राह सदा खुली रहती है। अंग्रेजी में कहावत है कि ‘देयर इज आलवेज ए वैकेंसी इन दी टाप।‘ एक कवि ने कहा है –

न किसी राह न रहगुजर से निकलेगा
हमारे पांव का कांटा हमीं से निकलेगा।
इसी गली में एक बूढ़ा फ़क़ीर गाता है,
कि तलाश कीजै ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा।।

बन्धुओं विश्वविद्यालय का नाम तभी सार्थक होता है, जब वहां कला विज्ञान, साहित्य के साथ रचनात्मक कौशल का विकास हो। इस कार्य में छात्रों और अध्यापकों को मिलकर चलना पड़ता है। गुरु को दृष्टिवन्त होना चाहिए था। अर्थात् उसे प्रतिक्षण सजग दृष्टि से अपने छात्रों को देखना पड़ता है। जैसे- मूर्तिकार पत्थर को तराश कर एक सजीव सी लगने वाली प्रतिमा गढ़ देता है, उसी प्रकार शिक्षक को अपने विद्यार्थियों को गढ़ कर समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बनाना पड़ता है। इस कार्य में सदैव जागरूकता की आवश्यक होती है। जरा-सी चूक होने पर सब काम बिगड़ जाता है। एक मूर्तिकार की बिगड़ी हुई मूर्ति की तरह। इसके लिए छात्रों को भी खुले मन से, खुली दृष्टि से और सम्पूर्ण चेष्टा से आचरण सम्मुख रहना चाहिए। तभी हम एक पूर्ण मनुष्य का निर्माण कर सकते हैं। सर्वांगीण मनुष्य का निर्माण ही शिक्षा का उद्देश्य है, जिसे हमें पूरा करना है। तुलसीदास ने कहा-गुरू सिष बधिर अंध कर लेखा। एक सुनई एक नहिं देखा।श्यह कठिन युग का प्रमाद है, पर इसे बदलने का पुरूषार्थ हमारे देश के आचार्यों में है। जब हमारे वैज्ञानिक, आचार्य चाँद तक चन्द्रयान भेज सकते हैं, तो हमारे विश्वविद्यालय के आचार्य भी अपनी धरती को शीतलता और सौम्य चांदनी प्रदान कर सकने योग्य छात्रों का अपने आचरण से निर्माण कर सकते हैं।

मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि आचरण की शिक्षा के बिना साहित्य, मानविकी या विज्ञान किसी प्रकार की शिक्षा का कोई लाभ देश और समाज को नहीं दे सकता। हमने अपने आचरण से पूरे विश्व को प्रभावित किया है। केवल धर्म और आध्यात्मक से नहीं।

एतद्देश प्रसूतस्य सकाशदग्रजन्मनः
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्या सर्व मानवाः।

भाईयों! स्वामी विवेकानन्द ने यह सन्देश दिया था कि हमें अपने जीवन-दर्शन के साथ पश्चिम के जीवन सौष्ठव को जोड़कर नवीन भारत का निर्माण करना होगा। आज विज्ञान की सारी उपलब्धियाँ और जीवनगत सुख-सुविधाएँ हैं पर इनके साथ यदि हम अपने आध्यात्मिक जीवन को जोड़कर नहीं चलेंगे तो विकास के स्थान पर विनाश का वरण करेंगे। आइंस्टीन ने कहा भी था कि हमने विज्ञान का विकास करके विश्व को विनाश के कगरा पर लाकर खड़ा कर दिया है। यह विनाश तभी रूक सकता है, जब विज्ञान का अध्यात्म के साथ योग हो जायऔर यह कार्य भारत ही कर सकता है। हमें इस चुनौती को स्वीकार करना पड़ेगा। यह काम कौन करेगा? सरकार करेगी या कोई फरिश्ता करेगा? जवाब यह है कि इसे हमें ही करना होगा। हमें उठना है, जागना है और अपने से श्रेष्ठ जनों का बोध प्राप्त करते रहना है। उतिष्ठ्त, जाग्रत वरान्निबोधतः।

आपसे यह निवेदन करना चाहता हूँ कि चूंकि अब इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। तब से इस विश्वविद्यालय ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं। केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनने के बाद प्रथम दीक्षान्त समारोह अभी गत महीने में बड़ी सफलता के साथ सम्पन्न हुआ। पहले यहाँ के संबद्ध कालेजों में स्नातक तक शिक्षा दी जाती थी। अब प्रशासन ने शिक्षण और शोध कार्य को उन्मुक्त कर दिया। यह युग की आवश्यकता है कि इस बढ़ती आबादी में ‘हर व्यक्ति को शिक्षा और हर हाथ को काम मिले। मुझे यह भी बताया गया है कि वर्षों से चल रहे अराजकता के माहौल को दूर करने के लिए कठोर कदम उठाये गये हैं। स्वाभाविक है कि जब कठोर कदम उठते हैं, तो कुछ शोर शराबा होता है पर कार्य की गुणवत्ता के साथ सब कुछ शान्त हो जाता है। रोमन में एक कहावत है-‘काम खुद बोलता है। पिछले दिन प्रयागराज में जो कुम्भ लगा वह विश्व इतिहास का एक धरोहर बन गया है। मैं चाहता हूँ कि यह विश्वविद्यालय भी अपनी शैक्षिक और शिक्षणेत्तर गतिविधियों में भी एक धरोहर बने। पिछले तीन वर्षो में कुलपति प्रो0 रतन लाल हांगलू के निर्देशन में विश्वविद्यालय निरन्तर आगे बढ़ा है। पिछले दो वर्षो में महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालय में 500 से ज्यादा षिक्षकों की नियुक्ति हुइ्र्र। कुलपति जी ने 130 वर्ष पुराने विजयनगरम् हाल पुनरोद्धार कराया। आधारभूत संरचना का विकास किए वगैर हम जमाने के साथ कदम मिलाकर नहीं चल पाए। ऐसे अनेक साकारात्मक बड़े परिवर्तनों के लिए यहाॅ के कुलपति जी बधाई के पात्र है। मै प्रो0 रतन लाल हांगलू की सकारात्मक उर्जा और दूरदर्शिता की भूरि-भूरि प्रशंसा करता हॅू।

मैं अपने को स्वयं इस विश्वविद्यालय से जुड़ा मानता हूँ। इसका मोटो बरगद वृक्ष के नीचे लिखा है ष्फनवज त्ंउप ज्वज ।तइवतमेष् जिसका अर्थ है जितनी शाखाएं उतने वृक्ष। इसी की एक शाखा गोरखपुर विश्वविद्यालय है। यहाँ के कुलपति श्री भैरव नाथ झा, वहाँ के कुलपति बनकर गये तो उन्होंने यहीं के पाठ्यक्रम को ही गोरखपुर में प्रारम्भ किया और यहाँ से चुनचुन कर आचार्यों को ले गये। मैंने वहीं से संस्कृत विषय की परास्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। अतः मैं स्वयं को आपसे जोड़ते हुए आशा करता हूँ कि आपका विश्वविद्यालय अपने मानक में उच्चतम स्तर प्राप्त करे और सभी छात्र और आचार्यगण प्रतिष्ठा प्राप्त करते रहें। इस शुभकामना के साथ मैं आपके प्रति अपना स्नेहपूर्ण आभार व्यक्त करता हूँ।

धन्यवाद ,जयहिन्द

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