Saturday , 24 June 2017
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Judicial Accountability Book Inaugration

Judicial Accountability Book Inaugration

भारतीय गणतंत्र की स्थापना (26.01.1950) के पश्चात संसदीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के समुचित ढंग से परिचालन हेतु मान्टेस्क्यू के शक्ति पृथक्करण सिद्धान्त को प्रशासन का आधार माना गया जिसके अनुसार लोकतंत्र के तीनों स्तम्भ – कार्यपालिका, न्यायपालिका व विधायिका अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह समुचित ढंग से कर सके। कार्यपालिका व विधायिका की कार्य प्रणाली, उपलब्धियों व असफलताओं पर अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार हर नागरिक को है। इनकी आलोचना व प्रशंसा ससद या संसद से बाहर विभिन्न फोरमों को माध्यम से की जा सकती है। परन्तु देश की न्यायपलिका में देश के प्रत्येक नागरिक का अटूट विश्वास होने के कारण हमारे न्यायालयों और न्यायाधीशों को बड़ी ही श्रृद्धा व सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। न्यायालय के किसी भी फैसले की संसद सहित किसी भी फोरम पर विवेचना या आलोचना नहीं होती। परन्तु विगत् कुछ वर्षों से न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्तियों में पारदर्शिता के अभाव न्यायापालिका व कार्यपालिका के बीच ठकराव कुछ विवादित फैसलों तथा कुछ न्यायाधीशों के संदिग्ध आचरण के कारण Judicial Accountability एक परिचर्चा का विषय बन गया है।

Judicial Independence के विषय में S.P.Gupta Case में जस्टिस भगवती ने कहा था

Concept of Indepence of Judiciary is a noble concept Which inspire the constitutional scheme and constitutes the foundation on which our democratic policy rests.

जस्टिस कुलदीप सिंह के शब्दों में

Independence of Judiciary is leesic feature of the constitution.

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि सन् 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के (तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी के चुनाव के विरूद्ध श्री राजनारायण की याचिका पर) जस्टिस सिन्हा के फैसले ने देश में आपातकाल की घोषणा करवा दी और देश के सभी शीर्ष नेताओं को जेल में डाल दिया गया। अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार छीन लिया गया था, सही अर्थों में देश में लोकतंत्र की हत्या कर दी गयी थी।

इसके पूर्व सन् 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी ने Committed Judiciary की अवधारणा की वकालत है और मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में जस्टिस सीलट की वरिष्ठता को नजरअन्दाज करके उनसे जूनियर जज की मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति हुई। इस घटना की पुनर्रावृत्ति सन् 1973 से जस्टिस खन्ना के सुपरसेशन के रूप में हुई। वास्तव मंे सर्वप्रथम जजों की नियुक्ति में ैनचमतेमेेपवद का प्रयास सन् 1951 में हुआ जब तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस कानिया की मृत्यु के पश्चात जस्टिस पतंजलि शास्त्री सीनियर मोस्ट जज को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति किया गया क्यांेकि सरकार जस्टिस बिजन कुमार मुखर्जी को मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करना चाहती थी जिसका विरोध जस्टिस मुखर्जी सहित सर्वोच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीश ने किया व त्यागपत्र देने की धमकी दे दी।

सन् 1970 में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस हिदयातुल्ला के रिटायरमेन्ट के समय सरकार उनके बाद मोहन कुमार मंगलम को मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करना चाहती थीं। परिणाम स्वरूप में 27 नवम्बर 1970 को सुप्रीम कोर्ट बार एशोसिएशन ने रिसोल्यूशन पारित कर सरकार के इस प्रयास (Mone) की निन्दा की और मांग की कि Senior Most Judge की मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का Convention जारी रखा जाए। 16 दिसम्बर को जस्टिस शाह की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश के रूप में हुई और उनको 21 जनवरी 1971 को त्मजपतम होना था। उनके उत्तराधिकारी के नाम की घोषणा 17 जनवरी तक नहीं हुई और ऐसी खबर थी कि किसी बाहरी व्यक्ति की मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति होनी है। 14 जनवरी 1971 को पुनः Super Court Bar Association ने पुनः इसके विरोध में Resolution पारित किया। परिणाम स्वरूप जस्टिस सीकरी की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश के रूप में घोषणा जस्टिस शाह के Retirement से मात्र तीन दिन पूर्व हुई। अर्थात Judicial Appointment में सरकार का वर्चस्व या वर्चस्व का प्रयास 1973 में ही नहीं बल्कि 1951 से ही रहा है। इस विषय में मैं आपको एक बात और स्पष्ट कर कि जस्टिस ए0यन0रे जिन्हें सन् 1973 में जस्टिस शीलट, जस्टिस हेगडे़ एवं जस्टिस ग्रोवर को सुपरसीड करके मुख्य न्यायाधीश बनाया गया, ने बैक राष्ट्रिकरण और प्रावी पर्स के मामले में अपने माइनरिटी जजमेण्ट में सरकार को सपोर्ट किया था।

Judicial Accountability पर चल रही बहस के मुख्यरूप से तीन बिन्दु हैं-

  1. जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता।
  2. जजों के न्यायालयों में लम्बित मुकदमें व मुकदमों के निपटान में Inordinate delay.
  3. Judicial Activism.
  4. म्हिलाओं पर अत्याचार के बढ़ते मामले व दोषियों के विरूद्ध कड़ी सजा के प्रावधान।

शुक्रनीति के अनुसार एक न्यायाधीश
’’ व्यवहार विद प्राज्ञा वृतशील गुणान्विता। रियो नित्रे समाये च धर्मज्ञास्सत्य वदिनः।।
निरालसा जित क्रोध काम लोभ प्रियवंदा। राज्ञा नियोजित व्यास्ते सम्यासर्वासु जतिषु।। ‘‘
अर्थात

“ One who is well versed in civil and criminal law and procedure, sprightful of sterling character, impartial towards friends and foes, of Dharma abiding nature, truthful, ever active and who has established control over anger, desire and greed and pleasant in speech and demeanour should be appointed of judge.”

एक Judge के इन्हीं गुणों के कारण इंग्लैण्ड, अमेरिका व अन्य पाश्चात्य देशों में जज को जस्टिस और भारत में न्यायमूर्ति कहा जाता है।
न्यायालयों मंे न्यायाधीश की सीट के पीछे “सत्यमेव जयते” का लोगो लगा होता है। जिसक अर्थ होता है सत्य की विजय हो क्या हमारी न्यायव्यवस्था सत्यमेव जयतके की चरितार्थ कर पा रही है। यह विचार का विषय है।
न्यायाधीशों की तटस्थता के विषय में पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस यम हिदायतुल्ला ने स्वीकार किया-

Every Judge has a destined stream of tendency in him. These tendencies are varied as the colures of an artist. There are also various appointment and methods for viewing legal problems. One judge may be influenced by one approach more then other.

विगत कुछ वर्षों में जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता के अभाव व ज्यूडिकल स्टैण्डर्ड के पतन से सभी को चिन्ता हुई है। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष श्री अरूण जेटली ने लिर्वाहन कमीशन रिर्पोट पर परिचर्चा में बोलते हुए कहा -

There are too kind of judges one who knows the law and two who knows the law minister” and opinion expressed by him strengthens the allegation that the influence of executive in appointment of judges cannot be ruled out unless a judicial commission is formed.

इसके अतिरिक्त Law commission ने अपनी रिपोट्र्स में National judicial commission बनाने पर जोर दिया है क्योंकि संविधान में प्रदत्त प्राविधान न्यायाधीशों की नियुक्ति व ट्रान्सफर में पारदर्शिता बनाये रखने हेतु काफी नहीं है। इसी प्रकार भ्रष्ट व Inefficient judges की Impeachment proceedings भी इतनी Complicated है कि जज का Impeachment हो ही नहीं सकता जैसा कि जस्टिस Rameswamy के विरूद्ध उनके ऊपर लगे आरोपों के सत्य पाये जाने के बावजूद सदन North और South के आधार पर बट गया और Impeachment proceeding पूरी नहीं हो सकी।

पूर्व मुख्य न्यायधीश जस्टिस चन्दचूर्ण ने 1983 में पटना में एक सेमीनार में कहा -

The present to the supreme court and the high court was outmoded and should be given a decent burial.

वर्ष 2009 में कर्नाटका हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद सुप्रिमकोर्ट Collegiums द्वारा सर्वाेच्च न्यायालय में नियुक्त किये गये। परन्तु Campaign for Judicial Accountability के प्रोटेस्ट के कारण Collegiums को उनका नाम ड्राप करना पड़ा। चीफ जस्टिस बालाकृष्णन ने उसे अपने Tenure का Worst moment कहा। इसी प्रकार कोलकाता हाई कोर्ट के जस्टिस सेन को Removal की मुख्य न्यायाधीश के पत्र के बावजूद उन्हें हटाया नहीं जा सका। लगभग 32 लाख रूपये के भ्रष्टाचार में प्रस्ताव पारित होने के बाद भी उन्होंने त्यागपत्र दिया और अपनी पेन्शन व अन्य लाभ बचाने मेूं कामयाब हो गये जबकि एक आम आदमी सरकारी कर्मचारी ऐसा नहीं कर सकता।

लम्बित मुकदमे व न्याय में देरी – एक प्रसिद्ध कहावत है “Justice deluged is justice denied” परन्तु हमारे उच्च न्यायालयों में 43 लाख से अधिक मुकदमे लम्बित पडे़ हैं जबकि Criminal procedure code के सेक्शन 309 में स्वीडी ट्रायल का प्रावधान है। हिन्दुस्तान टाइम्स में दिनांक 20/08/2012 की रिपोर्ट के अनुसार देश के तत्कालीन रेलवे मंत्री की हत्या 1974 में हुई और केश अब फाइनल हियरिंग के लिए आ रहा है। अर्थात देश के वरिष्ठ राजनेता के मामले में यदि 37 वर्षों का समय लग सकता है तो हम आम जनता को त्वरित न्याय कैसे दिला सकते हैं।

देश मं लम्बित मुकदमों की बढ़ती संख्या से निपटने हेतु विभिन्न कमेटियांें को निर्माण हुआ जैसे हाईकोर्ट एरियर्स कमेटी (1949) Revives Committee of 1967 और 1969, एरियर्स कमेटी 1990 और एरियर्स कमेठी 1993। उसके पश्चात क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को अधिक सुचारू बनाने हेतु National Police Commission की स्थापना हुई। इन सभी कमेटियों की रिपोर्टों व National Law Commission की रिकमेन्डेशन के बावजूद देश के न्यायालयों में लम्बित मुकदमों की संख्या में कमी न आना हमसभी के लिए चिन्ता की बात है।

Judicial Activism विगत कुछ वर्षों में ज्यूडिशिल एक्टिविस्म एक चर्चा का विषय बना हुआ है। अर्थात न्यायालय के क्षेत्र में Interference public Inters Litigation द्वारा विभिन्न सामाजिक संगठनों आदि की Petition पर न्यायालय प्रशासन को आदेश देकर गरीबों व साधन विहीन लोग जो आर्थिक तंगी के कारण न्यायालयों में न्याय के लिए नहीं आ सकते। यद्यपि इस तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि सरकारी एजेन्सियों, पुलिस, पर्यावरण, संस्थाओं पर न्यायालयों के आदेशों से आवश्यक दबाव पड़ता है। कई पर सरकार के आपस के विभागों में ही टकराव की स्थिति हो जाती है। यद्यपि यह भी सत्य है कि भ्रष्टाचार के सबसे बड़े मामलों जैसे 2-जी स्पेक्ट्रम स्कीम, कामनवेल्थ गेम घोटाले और कोयला आवंटन में विपक्ष के लाख प्रयासों के बावजूद कार्य न हो सके और अन्त में इन मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं संज्ञान लिया तब सरकार को कार्यवाही करनी पड़ी। परन्तु मेरे विचार मे लोकतंत्र के सफल कार्यान्वयन हेतु शक्ति प्रथक्करण के सिद्धान्त का अनुपालन अत्यन्त आवश्यक है।

16 दिसम्बर को 23 वर्षीय महिला के साथ राजधानी में हुई घटना के कारण पूरा तन्त्र, पूरा समाज शर्मसार हो गया। पहले भी इस प्रकार की घटनाएं होती रही हैं और आजादी के 65 वर्षों के बाद भी हम स्त्रियों की सुरक्षा हेतु बडे़ कानूनों का निर्माण नहीं कर पाये हैं। मौजूदा कानूनों में बलात्कार की पीडि़त महिलाओं के पुर्नवास की कोई व्यवस्था नही है।

इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर अपने अनुभवों व अध्ययन के आधार पर मैंने इस कृति के माध्यम से इन पहलुओं का समाधान खोजने का प्रयास किया है आशा करता हूँ कि पाठकों को इस पुस्तक से समुचित जानकारी मिलेगी।

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