Saturday , 22 July 2017
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गंगा : देश की जीवनधारा

गंगा भारत की जीवनधारा है यह केवल नदी ही नहीं, भारत की आस्था, संस्कृति , परंपरा, सभ्यता की स्वर्णिम इतिहास, प्रेरणा और पूजा है | विशाल जलराशि समेटे गंगा भारत की शाश्वत पहचान, आजीविका का उपक्रम और मर्यादा है| हिन्दू परंपरा में गंगा माँ है, अति पूज्य है गंगा के बारे में अनंतकाल से न जाने कितनी जनश्रुतियां प्रचलित हैं। राजा भागीरथ गंगा को अपने अद्भुत तथा सफल तप से धरती पर लाए थे । इस तपस्या ने उनको अमर एवं वंदनीय बना दिया । उनका प्रयास भागीरथ प्रयास के रूप में एक लोकप्रिय जनश्रुति बन गया । अब वह जीवनदयिनी माँ गंगा गंभीर संकट में है, सुदूर ऊचे हिमनंदों से ढके हिमालय के गंगोत्री से निकलकर बंगाल की खाडी में समा जाने वाली गंगा की कथा एक दारूण गाथा है |2510 कि०मी० की यात्रा में भारत के पाच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से गुजरते हुए भारत की 40 प्रतिशत आबादी को जीवन देती है हिन्दुआें के लिए विशेष रूप से वंदनीय गंगा जीवन के प्रत्येक प्रसंग से जुडी है मृत्यु के ठीक पूर्व गंगाजल की कुछ बूंदे मुंह में डालना मोक्ष का पर्याय है मृत्यु उपरांत गंगा में पंचतत्व शरीर का विलीन होना एक अंतिम आभिलाषा होती है अब वही गंगा अपने आस्तित्व के लिए जूझ रही है देश के ग्यारह राज्य गंगा के कछारी क्षेत्र हैं : उत्तरांचल, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल का बडा भाग गंगा की सहायक, उपसहायक तथा उप-उपसहायक नदियों का चारों और फैला कछारी क्षेत्र है गंगा का कछारी क्षेत्र विश्व के सर्वाधिक उपजाऊ तथा घनी आबादी वाला क्षेत्र है यह दस लाख वर्ग कि०मी० तक फैला है दर्जन भर प्रमुख सहायक नदिया और सैकडों छोटी बडी उपसहायक मौसमी, पठारी और मैदानी नदियों का जाल भारत के एक बडे भूभाग को कृषि/आजीविका के साथ जीवन की उम्मीदें बांधे रखता है। जिस प्रकार हमारे शरीर की मुख्य रक्त वहिनी सैकडों शिराआें और असंख्य कोशिकाआें को रक्त के जरिए पोषित करती है, गंगा भी ठीक उसी प्रकार भारत में जीवन और पोषण देती है । इसके बदले भारत के पांच राज्य, 29 नगर, 40 कस्बे, हजारों छोटे बडे गांवों की 40 करोड आबादी गंगा में असीमित सीवेज तथा मल-मूत्र छोडती है ।

आज गंगा विश्व की छठी सर्वाधिक प्रदूषित नदी है । विश्व की दस अत्यधिक प्रदूषित नदियों में गंगा एक है । गंगा के कछारी क्षेत्र में कृषि में उपयोग में आने वाले उर्वरकों की मात्रा सौ लाख टन है, जिसका पांच लाख टन बहकर गंगा में मिल जाता है । 1500 टन कीटनाशक भी मिलता है । सैकडों टन रसायन, कारखानों, कपडा मिलों, डिस्टलरियों, चमडा उद्योग, बूचडखाने, अस्पताल और सकडों अन्य फैक्टरियों का निकला उपद्रव्य गंगा में मिलता है । 400 करोड लीटर अशोधित अपद्रव्य, 900 करोड अशोधित गंदा पानी गंगा में मिल जाता है । नगरों और मानवीय क्रियाकलापों से निकली गंदगी नहाने-धोने, पूजा-पूजन सामग्री, मूर्ति विसर्जन और दाह संस्कार से निकला प्रदूषण गंगा में समा जाता है । भारत में गंगा तट पर बसे सैकडों नगरों का 1100 करोड लीटर अपशिष्ट प्रतिदिन गंगा में गिरता है । इसका कितना भाग शोधित होता होगा, प्रमणित जानकारी नहीं है । लक्ष्य है कि 2020 तक गंगा प्रदूषण मुक्त हो । यह बहुत बडी चुनौती है । कृषि से निकलते, गंगा में घुलते रसायन तथा लाखों टन ठोस अपशिष्ट ने प्रदूषण की समस्या को जटिल बना दिया है। पर्याप्त बजट, परिस्थितिकी का संरक्षण तथा समुदाय की प्रभावी भागीदारी जैसे पक्षों पर भी ध्यान जरूरी है ।

गंगा में उद्योगों से 80 प्रतिशत, नगरों से 15 प्रतिशत तथा आबादी, पर्यटन तथा धर्मिक कर्मकांड से 5 प्रतिशत प्रदूषण होता है । आबादी की बाढ के साथ, पर्यटन, नगरीकरण और उद्योगों के विकास ने प्रदूषण के स्तर को आठ गुना बढाया है । ऐसा पिछले चालीस वर्ष में देखा गया ऋषिकेश से गंगा पहाडों से उतरकर मैदानों में आती है, उसी के साथ गंगा में प्रदूषण की शुरूआत हो जाती है । धर्मिक, पर्यटन, पूजा-पाठ, मोक्ष और मुक्ति की धारणा ने गंगा को प्रदूषित करना शुरू किया, हरिद्वार के पहले ही गंगा का पानी निचली गंगा नहर में भेजकर उ०प्र० को सींचता है । नरौरा के परमाणु संयंत्र से गंगा के पानी का उपयोग और रेडियोधर्मिता के खतरे गम्भीर आयाम हैं । प्रदूषण की चरम स्थिति कानपुर में पहुंच जाती है, चमडा शोधन और उससे निकला प्रदूषण सबसे गम्भीर है । उस समूचे क्षेत्र में गंगा के पानी के साथ भूमिगत जल भी गम्भीर रूप से प्रदूषित है । इलाहाबाद में यमुना, गंगा से मिल जाती है, पवित्र संगम, यहां होने वाले स्नान और कुंभ मेले आस्था का बहुत बडा केन्द्र होते हैं पर करोडों लोगों द्वारा स्नान, शवदाह और पिंडदान, आस्थि विसर्जन के कारण गंगा का प्रदूषण सभी मान्य सीमायें पार कर खतरनाक हो जाता है । बनारस में प्रतिवर्ष 35000 तथा गंगातटों पर दो लाख से आधिक शवों का अंतिम संस्कार होता है । हजारों शवदाह आधे जले शवों को नदी में बहाना एक अन्य गम्भीर समस्या है । गंगातटों पर इस प्रदूषण से मुक्ति के लिए विद्युत शवदाह अच्छा तथा ईकोफ्रेंडली विकल्प है । हमारी धर्मिक मान्यतायें, विश्वास, परम्परा और मðतक से भावनात्मक संबंध विद्युत शवदाह में असमंजस पैदा करते हैं । मोक्ष, मुक्ति और परम शांति के अर्थ को फिर से परिभषित करना होगा ।

गंगा का सम्पूर्ण कैचमैंट क्षेत्र नगरीकरण, बसावट, उद्योग धंधों औरा अंधाधुंध अतिक्रमण से पटा है । इस क्षेत्र का हजारों वर्ष से सुरक्षित मूल प्राकृतिक स्वरूप अब समाप्त है । जंगल कट गये, वन्य जीवन विलुप्त हो गया, बची है तो आबादी, भीड, नगर, शहर, कस्बे, होटल, आश्रम, मठ, उद्योग धंधे और गंदगी के अंबार, सम्पन्न लोग आलीशान बंगले, आरामगाह, गंगा के कुदरती किनारों पर बनाते हैं । ऐसे बंगलों को वे अपना दूसरा और तीसरा घर कहते हैं और एश करते हैं। जिस देश में करोडों के पास पहला घर तक नहीं है वहां उनकी आरामतलबी के लिए दूसरा घर ? कैचमैंट क्षेत्र में जंगलों के विनाश से बडी तादाद में भूमि क्षरण और कटाव बढा है । गंगा का सम्पूर्ण प्रवाह मार्ग गाद से पट चुका है । ठोस कचरा, मलवा, मिटटी से लेकर टॉकसिक अपद्रव्य, पालीथीन, प्लस्टिक कचरा जड़ से अपघटित न होने वाला कचरा तक , गर्मियों में जलरशि सिकुड जाती है । पानी की कमी से नदी के बीच टापू उभर आते हैं । गंगा अब पूरे प्रवास मार्ग में भारी गाद भरने से कई मीटर उथली हो चुकी है । अल्प वर्षा में बाढ अकसर देखने में आती है । पानी गहराई में न समाकर सतह और किनारों पर फैलता है । किनारे पहले से ही बाजार, नगर और मठों, आश्रमों से पटे पडे हैं । आतिक्रमण की छूट, लूट और मनमानी है । सो साल दर साल बाढ आनी ही है

गंगा के बारे में आदिकाल से ही बहुत कुछ कहा, सुना और लिखा गया है । इसके प्रवाह मार्ग में हजारों वर्ष से सभ्यतायें पनपती रही हैं। संरक्षित सदानीरा गंगा का महत्व बहुत बडा है । यह जलरशि के साथ जीवन का पर्याय और सुरक्षा का विश्वास है । मरती नदी के साथ सुरक्षित जीवन की सभी संभावनायें समाप्त होने लगती हैं । भारत में आजीविका, कृषि, वन, वन्यप्राणी, पशु, परंपरायें, रीतिरिवाज, सांस्कृतिक विरासत और पहचान, लोकजीवन, संस्कार, हर्ष, विषाद जीवन और मृत्यु के साथ जीवन के समग्र ताने-बाने का केंद्र गंगा है । बच्चों की अलमस्ती और हुल्लड, युवाआें, की शक्ति और क्रियाशीलता, किसानों का भरोसा, बुजुर्गों का विश्वास, स्त्रियों का सौभाग्य और आबाद बस्तियों का भविष्य गंगा से ही है मवेशियों का जीवन, अमराई की बहार और खेतों की रौनक गंगा से ही है । यह समझ से परे है कि हम इस जीवनदयिनी, मोक्षदयिनी और पापनाशिनी कल्याणकारी गंगा के साथ इतने कठोर और निर्दयी क्यों हो गये ? बहती नदी चलती श्वास के समान होती है । रक्त शिराआें में बहता रक्त जिस तरह जीवन का भरोसा दिलाता है, ठीक उसी तरह गंगा और उसकी सहायक नदियों का जाल भारत की समृद्धि, प्रगति और जीवन की गतिशीलात का प्रमाण है ।

आज गंगा के आस्तित्व और भविष्य पर बेशुमार संकट है । हमारी गलत नीतियों और करतूतों ने हालात को और भी बदतर बना दिया है 1979 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने गंगा में प्रदूषण की विकरालता को समझते हुए एक समीक्षा की थी । 1985 में गंगा एक्शन प्लान का प्रारम्भ हुआ, पर गंगा की हालत नहीं बदली । गंगा बेसिन अथारिटी की स्थापना 2009 में हुई पर नतीजे नहीं मिले । 2014 में नममि गंगे परियोजना की घोषणा हुई है ।इसके अंतर्गत 2037 करोड खर्च होंगे , किनारों के बडे नगरों में घाटों के विकास हेतु 100 करोड रू खर्च होंगे । NRI को भी सहयोग हेतु कहा गया है । शहरी विकास मंत्रालय ने निर्मल धारा योजना के अंतर्गत गंगा तट पर बसे 118 नगरों में जल-मल शुद्धिकरण के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की योजना बनाई है । जिस पर 51000 करोड रू० खर्च होंगे । गंगा के प्रवाह को जल परिवहन के लिए भी उपयोग करने की योजना है । इलाहाबाद से हल्दिया तक जलमार्ग विकास परियोजना । 42000 करोड रू० की योजना 2020 तक पूरी होगी । हालांकि इस जलमार्ग योजना पर अनेक प्रश्न उठाए गए हैं। जैवविविधता की क्षति से लेकर नदी की सम्पूर्ण परिस्थितिकी के बिगाड तक के खतरों की आशंका जैसे प्रश्न हैं ।

गंगा के आस्तित्व से भारत का भविष्य जुडा है , पर ऐसा लगा कि यह सीवेज ढोने के लिए एक राष्ट्रीय नाला है । गंगा की छोटी बडी सहायक नदियों के प्रवाह थम रहे हैं । लगभग 60 प्रतिशत पानी, जो सहायक नदियां अपने कै चमैंट क्षेत्र से निचोडकर जोडती थीं, अब उनमें पानी जुटाने की क्षमता समाप्त हो गई । गंगा की सहायक नदियों के कैचमैंट क्षेत्र भी गम्भीर उथल-पुथल के शिकार हैं । इन क्षेत्रों का भूगोल और पर्यावरण पूरी तरह बदल चुका है । इनमें भी जंगलों की कटाई, बेतरबीत बसावट, अतिक्रमण और अनेक अवांछित गतिविधियों से क्षेत्रीय नदियां भी लगभग समाप्त ही हैं । गर्मियों में गंगा का प्रवाह 40 प्रतिशत शेष रहता है और यह पानी पिघलते हिमनंदों से आता है । एक दिन जब सहायक नदियां विलीन हो जायेंगी, हिमनद भी पिघलकर पर्याप्त पानी न दे पायेंगे तब भी क्या गंगा बह जाएगी ? लगातार पिघलते हिमनद तो यही कहते है कि शायद गंगा को वर्तमान रूप में भारत की भावी पिढीयां देख ही न पाएं ।

गंगा सिंचाई हेतु आतिदोहन के साथ भीषण प्रदूषण की शिकार है , वहां दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन के खतरे बढ रहे हैं । अब गंगा के साथ सिंधु सर्वाधिक खतरे में पडी दस नदियों में शमिल है । नदियों के किनारे बसी आबादी पर आजीविका के संकट बढ रहे हैं । ध्यान देने योग्य तथ्य है कि गंगा के सम्पूर्ण प्रवाह मार्ग में कृषि के अलावा आजीविका के लिए अनेक कामों के जरिए लाखों लोग केवल गंगा पर आश्रित हैं । गंगा का 60 प्रतिशत जल व्यापक स्तर पर सिंचाई इत्यदि के लिए डाइवर्ट हो रहा है । सतही जल तेजी से घट रहा है । भूमिगत जल पर निर्भरता बढी है । उद्योगों और कर्मकांडों से होने वाले प्रदूषण के कारण गंगा के पानी की गुणवत्ता समाप्त हो चुकी है । इसका सीधा असर कृषि, लाइव स्टाक और मानव स्वास्थ्य पर पड रहा है । जलजनित बीमरियों से होने वाली एक लाख से आधिक मौतें इसका प्रमाण हैं । गंगा में मौजूद जलीय जीवन नष्ट होने की कगार पर है । गंगा में 109 प्रकार की एवं अन्य जलीय जीव अपने हैबिटेट के विनाश की कगार पर हैं । हिल्सा, पंधास, बाछा, धारी और सोल जैसी अनेक मछली की प्रजतियां खतरे में है । गंगा में बढता प्रदूषण और घटता पानी इसका मुख्य कारण है । सुंदरवन डेल्टा में प्रवेश करने के बाद गंगा का 90 प्रतिशत पानी निकाल लिया जाता है ।

नदियों की दुर्दशा के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं। यह आधुनिक विकास के जरिए समूची प्राकृतिक प्रणलियों के तहस-नहस का ही परिणाम है कि गंगा सहित भारत की सभी नदियां खतरे में हैं । गंगा का उदगम पिछले दस वर्षों में 2000 मीटर पिघलकर सिकुड चुका है। समूची धरती पर ग्लोबल वार्मिंग और मौसम बदलाव के असर तो ग्लोबल हैं किन्तु स्थानीय क्रियाकलाप भी हालात को बिगाड रहे हैं। गंगोत्री के पास ढाबों की गहमागहमी और मौजमस्ती के लिए जमा होती भीड ठीक ननहीं । उदगम से 400 मीटर के दायरे में जलती भट्टियां, हजारों लीटर इधन का फूंका जाना, धुंआ, गरमी, हिमखंडों को तेज गति से पिघलाने के लिए काफी हैं । गोमुख वास्तव में इन सभी क्रियाकलापों से मुक्त होना चहिए ।

चौखंभा का पच्चीस कि०मी० लंबा क्षेत्र है। हिमालय की चौखंभा समूह की चोटियों से सटे हिमनंद, विश्व के सबसे बडे हिमनंद हैं । 7143।1 मीटर अल्टीट्यूड से ये हिमनंद शुरू होते हैं और चौखंभा से गोमुख के नुकीले छोर पर समाप्त होते हैं । ये छोर 4000 मीटर अल्टीट्यूड पर हैं, यही भागीरथी नदी हिमनद के नथुने से निकलती है और देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर गंगा का निर्माण करती है। भागीरथी गंगा का प्रमुख श्रोत हैं किन्तु जलभराव की दृष्टि से अलकनंदा की हिस्सेदारी आधिक अल्टीट्यूड उदगम से लेकर समुद्र तक पहुंचने की नदी यात्रायें गम्भीर निगरानी और सुधार चाहती हैं । अलकनंदा के साथ पिंडर, घौलीगंगा, रामगंगा और मंदकिनी जैसी धाराएं भी मिलती हैं । कर्णप्रयाग में ही अलकनंदा पिंडर से मिलती है। अब पिंडर पर अनेक पन बिजली परियोजनायें प्रस्तवित हैं । इस सम्पूर्ण क्षेत्र में वनों की कटाई, निर्माण और भारी भरकम परियोजनाआें से पूरा परिस्थितिक ढांचा बदला और बिगडा है इसका परिणाम 2013 में केदारनाथ त्रासदी के रूप में हम देख चुके हैं ।

पर्यटन, बेतरतीब निर्माण, पनबिजली योजनायें और बांधों के निर्माण से समूचा हिमालच क्षेत्र आति संवेदनशील हो चुका है। नदियों के मार्ग, नदी के तट में अवरोध पहिüडयों पर बारूदी विस्फोट और सडकों, सुरंगों के निर्माण से स्थितियां बद से बदतर हुई हैं । 557 बांध परियोजनायें जो प्रस्तवित हैं यदि क्रियान्वित हुइ तो हिमालच, गंगा, उत्तराखंड का पर्यावरणीय विनाश तय है। गंगा बहती है, इसलिए नदी है, आविरल है, नदी का बहना बंद होने का अर्थ नदी की मृत्यु है। फिर गंगा की मृत्यु का अर्थ कितना भयावह हो सकता है? बांधों का निर्माण जैव विविधता की क्षति के साथ वनों का विनाश लाता है। भूकंप, भूस्खलन, भूक्षरण के साथ पूरे क्षेत्र को आपदाआें में झोंक देते हैं । इन परिस्थितियों में सम्पूर्ण विकास प्रक्रिया का पुनरावलोकन आवश्यक है। ईकोफ्रेंडली विकास के माडल, छोटी परियोजनायें, गैर पारंपरिक ऊर्जा का दोहन, जनभागीदारी के साथ सटीक पर्यावरणीय प्रभाव पर अध्ययन होने चहिए ।

गंगा के जल में उपस्थित बैक्टीरियाफ़ेज़, मौजूदा बैकटीरिया को नष्ट करते हैं किंतु एक सीमा तक ही , गंगा के पानी में 12 वर्ष की सतत मानीटरिंग चल रही है। देखने में आया है कि बैकटीरिया की आबादी लगातार बढ रही है। प्रति 100 मि०ली० पानी में फीकल कोलीफार्म बढ रहे हैं , बी०ओ०डी० 40 mg लीटर है। जनजनित बीमरियों जैसे गेस्ट्रोइनवाइटिस, कॉलरा, डिसेन्ट्री, हैपेटाइटिस तथा टाइफाइड जैसी बीमरियों की दर 66 प्रतिशत दर्ज की गई । कोलीफार्म बैकटीरिया का स्तर 6000 के आसपास है जो किसी भी मानक में या किसी भी तरह के उपयोग के लिए ठीक नहीं पाया गया, कानपुर के चमडा उद्योग से जहरीले क्रोमियम, मान्य सीमाआें से 70 गुना आधिक पाया गया , मछलियों के शरीर में पारे की मात्रा बहुत आधिक है। इस कार्बनिक मरकरी का संबंध मछलियों के खान-पान और लंबाई में पडता है। गंगा में मौजूद डालफिन विश्व की फ्रेश वाटर डॉल्फिन श्रेणी में आती हैं , वे भी लोप होने के खतरे से जूझ रही हैं , सिंचाई बांधों तथा पन बिजली परियोजनाआें के कारण डॉल्फिनस का नदी में स्वतंत्र भ्रमण बधित हुआ है। उनकी संख्या घटकर 2000 तक पहुंच चुकी हैं, बांधों से जंगल बर्बाद होंगे, देवप्रयाग का कोटली भेल बांध 1200 हैक्टेयर जंगल को डुबा देगा, जिससे महाशीर जैसी मछली की प्रजाति लुप्त हो जाएगी ।

अब गंगा की सफाई को इसे आविरल निर्मल और पूरी तरह प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए भारत सरकार युद्ध स्तर पर सामने आई है। जल संसाधनों के साथ ”गंगा” आभियान उच्च प्राथमिकता पर लिया गया है। पृथक मंत्रालय का बनाना सरकार की गंगा के प्रति गम्भीरता का परिचायक है। कई स्तरों पर प्रयास शुरू किये जा रहे हैं , नए एक्शन प्लान में 2022 तक गंगा के किनारे बसे सभी गांवों को ”खुले में शौच” से पूरी तरह मुक्त किये जाने का संकल्प है। राष्ट्रीय गंगा निगरानी केन्द्र का गठन एक अन्य पहल है। नदी के किनारों पर नदी नियामक नियमों को सख्ती से लागू करवाना, गंगा ज्ञान केन्द्र की स्थापना जो नदी विज्ञान पर गंगा विश्वविद्यालय जैसे संस्था बनाएगा , जलीय जीवन की सुरक्षा की जा रही है जिसमें डॉलफिन, घड़ियाल और कछुए शमिल हैं , बालू खनन पर नई नियम बनाने की बात की गई है। पुनर्वास तथा गंगा के किनारे मौजूद STPs का उन्नयन भी एक लक्ष्य है। कानपुर में होने वाले औद्योगिक प्रदूषण नगरों में नदी और तटों का विकास हो जिससे नदी सुंदर स्वच्छ लगे , इस प्रबंधन पर भी ध्यान दिया जाएगा ।

एक नया पक्ष जो गंगा सफाई आभियान से जुडने जा रहा है – हिन्दू परंपराआें और मान्यताआें के अनुसार धर्माचार्य को विश्वास में लेकर उनकी स्वीकृति / सहमति से गंगा मित्र गतिविधियों के संचालन / शवों की अंत्येष्टी, पूजा सामग्री का विसर्जन और मूर्तियों का विसर्जन कुछ ऐसे ही पक्ष हैं, इन सभी कर्मकांडों के लिए ऐसी सुविधायें देना और व्यवस्थायें बनाना जरूरी है, जो गंगा को प्रदूषण से बचा सके । छोटे-छोटे प्रयासों से बडे परिणाम मिलते हैं – यह समझाना होगा , ईकोफ्रेंडली शवदाहगृह, पूजा स्थानों, मूर्ति विसर्जन स्थानों के लिए उचित स्थान, अधजले शवों को गंगा में फ़ेंकने के स्थान पर उनके उचित प्रबंधन की व्यवस्था भी शमिल है। गंगा की सफाई-शुद्धि के लिए साधु संतों का सहयोग और सहमति ली जा रही है। उन्हें समझाया जा रहा है कि ऐसी तकनीकें ही ठीक हैं जो गंगा में प्रदूषण को रोक सकें ।

गंगा प्रदूषण मुक्त , शुद्ध रहे, बाधाआें से मुक्त होकर आविरल बहे और बहती रहे इसी में भारत का हित है। इस हेतु भारत सरकार की पहल और प्रयास सराहनीय है। इसके साथ ही गंगा किनारे के पांच राज्यों, सैकडों नगरों और उद्योगों को भी जुटना होगा । वैज्ञानिक, जल विज्ञानी, भूगर्भशास्त्री, सलाहकार, नीतिनिर्माता, पर्यावरणविद, गैरसरकारी संगठन, विशेषज्ञ, धर्मिक प्रमुख, साधु संत, गंगा के किनारे आजीविका चलाने वाले मछली पालक मल्लाह, नविक, कृषक, मजदूर से लेकर देश का प्रत्येक नागरिक अपनी सम्पूर्ण चेतना से इस समस्या को समझे और अपने हिस्से का योगदान दें, तभी हम स्वच्छ, निर्मल, प्रदूषणमुक्त आविरल गंगा की कल्पना साकार कर सकते हैं, हमारा दृढ निश्चय, राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य बोध और माँ गंगा की रक्षा का संकल्प आनिवार्य है। यह अपरिहार्य भी है तकि गंगा बहे, बहती रहे ।

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