Saturday , 8 May 2021

नारी के सम्मान की सुरक्षा सरकार व् समाज का सामूहिक उत्त्तरदायित्व

वैदिक भारत में नारी का स्थान पूजनीय व् सम्मानित था, परन्तु आज के पुरुष प्रधान समाज में नारी को अपने सम्मान व् सुरक्षा हेतु सदैव पुरुषों पर सदैव आश्रित माना जाता रहा है l बचपन में पुत्री के रूप में पिता पर आश्रित, युवावस्था में पत्नी के रूप में पति पर आश्रित और वृध्दावस्था में माँ के रूप में पुत्र पर आश्रित रही है l परन्तु आज के आधुनिक युग में जहाँ स्त्री आर्थिक रूप से स्वावलम्बी हो चुकी है, शिक्षा के हर क्षेत्र में पुरुषों का कड़ी प्रतिस्पर्धा दे रही है परन्तु सम्मान व सुरक्षा की दृषिट से काफी असहाय व् असहज अवस्था में है l दिन प्रतिदिन स्त्रियों के साथ छेड़ छाड़ व् बलात्कार के घटनाये घटती रहती है और उनके सम्मान व् सुरक्षा की मांग चारो और होने लगी है l
16 दिसंबर 2012 के घटित निर्भया कांड ने पूरे समाज को विस्मृत कर दिया l विश्व में लोकतांत्रिक सरकारों के गठन के पश्चात कई देशो में इन्हे मतधिकार से वंचित कर दिया गया l भारत में इसका जीता जागता उदाहरण 1986 में देखने को मिला जब सर्वोच्च न्यायलय ने शाहबानो मामले में मुसलमान स्त्रियों को गुजारा भत्ता देने हेतु एक एतिहासिक निर्णय दिया परन्तु तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सविधान में संसोधन कर सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को निष्क्रीय कर दिया l
यदि भारत की वैदिक कालीन परम्पराओ का अध्ययन करे तो निष्कर्ष निकलता है कि भारतीय परम्परा और संस्कृति के संवाहक वेदो में पत्नी को पति के तुल्य मन गया है , ऋग्वेद में कहा गया है की पत्नी ही घर है (जाया इद अत्तम् भृ 3.5.3.4) l अर्थववेद में पत्नी को पति के घर की साम्राज्ञी माना गया है शतपथ ब्राह्मण (5.16.10) भाग में स्पष्ट वर्णन है की पत्नी के साथ ही पति को यज्ञ करने का अधिकार है नारी के बिना नर का जीवन अधूरा है l
अर्थववेद में अन्यत्र कहा गया है .

यत नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्त तत्र देवता:
यत्रेतास्तु पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: :क्रिया: l

अर्थात जिल कुल में नारी की पूजा अर्थात सत्कार होता है उस कुल में दिव्य गुण वाली संतान होती है और जिस कुल में स्त्रियों के पूजा नहीं होती वहां सभी क्रिया निष्फल है l
ऋग्वेद की रिचाओ में लगभग 414 ऋषियों के नाम मिलते है l जिनमे से 30 नाम महिला ऋषियों के है l वैदिक काल में नारियाँ बहुत विदुषी और पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली होती थी l पति भी पत्नी के इच्छा और स्वतन्त्रता का सम्मान करता थे l वैदिक कल में वर के चुनाव में वधु की इच्छा सर्वोपरि होती थे फिर भी कन्या पिता की इच्छा को महत्व देती थी l यदि कन्या आजीवन अविवाहित रहना चाहती थी तो वह अपने पिता के घर में सम्मान पूर्वक रह सकती थी , वह घर के हर कार्य में साथ देती थी और पिता के सम्पत्ति में हिस्सेदार होती थी l संतान वैदिक धर्म में जहा पुरुष के रूप में देवताओं और भगवानों की पूजा अर्चनk होती थी वही देवियो के रूप में माँ सरस्वती लक्ष्मी और दुर्गा का वर्णन मिलता है l वैदिक काल में नारी माँ, देवी, साध्वी , गृहिणी, पत्नी, बेटी के रूप सम्माननीय थी l
बाल विवाह की प्रथा तब नहीं थी नारी को पूर्ण रूप से शिक्षित किया जाता था, उसे वही विधा सिखाई जाती थी जो पुरष को प्राप्त थी जैसे वेद, ज्ञान, धनुविधा ,नृत्य संगीत शास्त्र आदि नारी को सभी कलाओं में दक्ष किया जाता था और बाद में उसके विवाह के विषय में सोचा जाता था l वैदिक परम्परा में दाम्पत्य जीवन के सुख का आधार परस्पर प्रेम सहयोग और सम्मान की भावना थी आपसी सामंजस्य से ही पति पत्नी अपने और परिवार के उन्नति में सहायक हो सकता थे l इस काल में काली को विनाश का प्रतिरूप लक्ष्मी को सम्पन्नता का प्रतिरूप और सरस्वती को विधा का प्रतिरूप मन गया है l ऋृग्वेद घोष लोपमुद्रा मैत्रेय और गार्गी के विद्धवता का बहुत विस्तृत वर्णन मिलता है l परन्तु महाभारत के युद्ध के पश्चात नारी की स्थिति क्षीण होती चली गयी l इस युद्ध के पश्चात धर्म का पतन हो गया और समाज बिखर गया l इस युद्ध में मारे गया पुरुषों की स्त्रियां विधवा के रूप में बुरे दौर में फंस गयी l राजनितिक शून्यता के चलते राज्य असुरक्षित होने लगे l असुरक्षित राज्य में अराजकता और मनमानी बढ़ गयी l फलस्वरूप नारियाँ सामाजिक, धर्मिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक शोषण का शिकार होने लगी और मध्यकाल आते आते पुरुष के साथ चलने वाले स्त्री पुरुष की सम्पति के तरह समझे जाने लगी धर्म और समाज के नयी व्यवस्थाओं ने नारी को पुरुष से नीचा और उपयोग के वस्तु बनाकर रख दिया l वैदिक युग की नारी धीरे धीरे अपने देवीय पद से नीचे खिसककर मध्यकाल के सामंतवादी युग में दुर्बल होकर शोषण का शिकार होने लगी l परन्तु आज के आधुनिक व् पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित समाज में शिक्षित व् आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद भी असुरक्षित है l हर रोज नारियो पर हो रही छेड़छाड़ बलात्कार मानसिक उत्पीड़न से सभी को पीड़ा हो रही है और पूरा समाज शर्मसार हो रहा है शर्म तो इस पर आती है के हमारे समाज में कुछ ऐसे पिशाच है जिनके पास उनकी अपनी पैदा की हुई बेटी भी सुरक्षित नहीं है 16 दिसंबर 2012 में दिल्ली में चलती बस में लड़की के साथ हुए बर्बरतापूण बलात्कार की घटना जिसके कारण बालिका की मृत्यु हो गयी ने पुरे देश को झकझोर दिया यधपि स्त्रियों के प्रति इस प्रकार की घटनाये पहले भी होती रही है लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि l इस घटना के सर्वत्र निंदा हुई और सरकार ने इन घटनाओ की पुनर्रावृत्ति रोकने के लिया पूर्व न्यायधीश जस्टिस जे एस वर्मा की अध्यक्षता में समिति बनाने की घोषणा की l कमेटी ने देश के नागरिको और विभिन्न सामाजिक संगठनो से इस विषय में
सुझाव मांगे l जिसके प्रति उत्तर में मैंने भी कुछ सुझाव जस्टिस वर्मा कमेटी को भेजे थे –

  1. इन केसेज के निपटान ने तेजी लायी जाये प्राय ऐसे मामलो के निपटान में 4 से 6 वर्ष का समय लग जाता है इस और जल्दी निपटाया जाना चाहिए इस संबंध में विलटी होना में मोहंती केस (2006) जिसमे एक जर्मन महिला के साथ बलात्कार हुआ था, अलवर के फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के जज आर के महेश्वरी ने इस केस का निपटारा मात्र 9 दिनों में किया इससे यह स्पष्ट हो जाता है के ऐसे मामलों का निपटारा जल्दी हो सकता है |
  2. पीड़ित के कौंसिलिंग की जानी चाहिये जिससे उनमे इतना आत्मविश्वास आ सके की ट्रायल के दौरान बेबाकी से कोर्ट को आप बीती सुना सकें |
  3. बलात्कार से पीड़ित महिल का बयान को उचित महत्व दिया जाना चाहिये प्राय इनके बयान पर conservative society में भरोसा नहीं किया जाता |
  4. बलात्कार के मामले में महत्वपूर्ण फोरसोनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने हेतु सरकार द्वारा उचित व्यवस्था होनी चाहिये जिससे आवशयकता पड़ने पर second opinion लिया जा सके |
  5. Child sex abuse के मामले में विशेष प्रावधान न होने के कारण अपराधी छूट जाते है
  6. बलात्कार के मामले में 20 वर्ष के सजा सा प्रावधान तथा रेप व् हत्या में आजीवन कारावास का प्रावधान किया जाना चाहिए |

जस्टिस वर्मा कमिटी ने लगभग 80,000 सुझाव प्राप्त किया और 23/1/2013 को दी गयी अपनी 630 पेज की रिपोर्ट में उपरोक्त सुझावों को भी शामिल किया और भारत सरकार ने जस्टिस वर्मा कमिटी रिपोर्ट के आधार पर अध्यादेश जारी किया जिससे बाद में संसद में मंजूरी मिल गयी अब महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने हेतु कड़े कानून बन चुके है, पुलिस भी इन अपराधों को रोकने हेतु कड़े कदम उठा रही है कई सामाजिक संगठन भी इस पर काम कर रही है परन्तु इस विषय पर हमे आशातीत सफलता प्राप्त नहीं हो पा रही है और महिलओं के प्रति अपराधो की संख्या में वृदि हो रही है l हाँ यह अवश्य है की पहले समाज के डर से इस प्रकार के अपराध की रिपोर्ट दर्ज नहीं करायी जाती थी परन्तु अब महिलाओं में ऐसी जागरूकता आयी है के वे अपने साथ हो रही घटनाओं की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करने पंहुच जाती है यह एक सकारात्मक लक्षण है l
अब प्रश्न यह उठता है कि इन मामलो की बढ़ती संख्या पर रोक कैसे लगायी जाये क्या केंद्र सरकार या राज्य सरकार मिलकर इसे रोक सकती है या पूरे समाज को और सरकार को मिलकर इस समस्या से लड़ना पड़ेगा l हमारे समाज में महिलाओं को सहनशीलता का गहना पहनाया जाता है और पुरुष को स्वावलम्बी और मनमाना रवैया अपनाने के छूट दी जाती है बचपन से ही विभाजन का यह बीज जब बड़ा होकर वृक्ष का रूप ले लेता है तो स्त्रियों के
अपमान की विकृत मानसिकता को जन्म देता है इसके इलाज की प्रक्रिया जन्म से ही प्राम्भ की जानी चाहिये l
कड़े दंड का प्रावधान कर देने मात्र से विकृत मानसिकता नहीं बदलने वाली l बलात्कार, स्त्रियों के साथ छेड़ छेड़ा जिसे संस्कृति की उपज है, उससे छुटकारा पाना आवश्यक है l इससे छुटकारा पाये बगैर स्त्रियों पर बढ़ते अत्याचारों रोकने के तात्कालिन समाधान सफल नहीं हो सकते l अगर कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान कर भी दिया जाये तो बलात्कार छेड़ छाड़ जैसे घटनाओं के पुनर्रावृतित रोकने के दीर्धकालीन उपाय करने होंगे महिलाओं को लेकर समाज में तरह तरह की विसंगतियां है l हम मनोरंजन हेतु फिल्मो में टेलीविजिन पर बहुत फ़ूहड़ ढंग से पेश करते है और बाजार ने स्त्री को प्रदर्शन की वस्तु बना दिया है इन विडंबनाओं के रहते स्त्री को उसका सम्मान नहीं मिल सकता आज लैंगिक संवेदनशीलता बढ़ने के आवश्यकता है स्त्री घर से निकलेगी अपनी इच्छानुसार कपडे धारण करगी ,अपनी साथ हो सके गलत व्यवहार के विरोध में आवाज उठायेगी l जो इस सब का विरोध करते है या इस लड़कियों का प्रति होने वाल गलत व्यवहार का सब मानते है ऐसे लोगो का सामाजिक बहिष्कर होना चाहिए और इन्हे घर बैठने के आवश्यक्ता है l
हमारे समाज में वैदिक काल से समाज से संस्कृति व् संस्कारो की रक्षा की जाती रही है हमारे वैद पुराण सkहित्य, पौरणिक कथायें हमें संस्कृति को समझाने का प्रयास करती है और नीतिवृद्ध तरीको से चलते हुआ सुकर्म करते हुये जीने के कला सिखाती है l इनमे अपने बड़ो और नारी का सम्मान सिखाती है हर व्यकित अपने धर्म का पालन करे यही समाज निर्माण का मूलमंत्र है समाज के सुचारू रूप से संचालन हेतु परिवार आस्तित्व में आये और हमारे ऋषियों के उपदेशों का आदर्श मानकर समाज उसी के अनुरूप चलने लगा l समाज में बड़ो और स्त्री को आदर की दृष्टि से देखा जाता था लेकिन आज के आधुनिक जीवन में पाश्चात्य के प्रभाव में न बड़ो का सम्मान रह गया है और न नारी का सम्मान रहा गया है हम अपनी सनातन संस्कृति से दूर होते जा रहें है परिणाम स्वरुप स्त्रियों के प्रति लोगों के दृष्टिकोण में परिवर्तन होने लगा है उनके प्रति सम्मान समाप्त होता जा रहा है
स्त्रियों के सम्मान व् सुरक्षा व् सुनिश्चित करने हेतु हमे अपने संस्कृति और संस्कारो से जुड़ा रहना अत्यंत आवश्यक है स्त्रियों के प्रति बढ़ने अपराधों को रोकने में हम तभी सफल हो सकेंगे जब दिग्भ्रमित युवकों को अपनी संस्कृति और परम्परा से अवगत करा पाये l सरकार का प्रयास तभी सफल हो पायेगे जब हमारे समाज में स्त्रियों के सम्मान के प्रति एक सकरात्मक वातावरण तैयार हो जो हम आधुनिक से भरी चमक धमक भरी दुनिया में खो चुके है |

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