Thursday , 13 August 2020

पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की 103 वीं जयंती, काशी विश्व विद्यालय

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के महामना सभागार, मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की 103 वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में सम्मलित हुआ तथा कार्यक्रम में आये गणमान्य लोगों को सम्बोधित किया।

कार्यक्रम को मेरा सम्बोधन

स्वतंत्र भारत के मौलिक विचारक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक पुरुष, भारतीयता के चिंतक, श्रम, सौजन्य एवं शालीनता के प्रतीक, पं. दीनदयाल उपाध्याय जी का पूरा जीवन आधुनिक भारत और ‘न्यू इंडिया’ के लिये प्रेरणा स्रोत है। सादा जीवन और उच्च विचार के प्रतीक पुरुष पं. दीनदयाल जी ने भारतीय चिति की विराटता का दर्शन कराया। पं. दीनदयाल जी का चिंतन पूरे भारत का चिंतन है। भारतीय सनातन मूल्यों का चिंतन है। वे संकल्प से सिद्धि की यात्रा अपने मौलिक चिंतन के माध्यम से करना चाहते है। ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः’’ ही दीनदयाल जी के चिंतन का आधार है। उनका पूरा चिन्तन ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना पर आधारित है। ‘व्यष्टि’ एवं ‘समष्टि’ की उनकी व्याख्या ने भारत में भारतीयों की चिति को समझाया। त्याग, संयम, विनम्रता और कर्तव्य से ही भारतीय ‘चिति’ को समझा जा सकता है। भारतीय परम्परा का आधार ‘व्यष्टि’ है। व्यक्ति से जो बोध होता है वह पूर्णता का प्रतीक नहीं है। दीनदयाल जी ने ‘व्यष्टि’ का प्रतिपादन किया, व्यक्ति का नहीं। दीनदयाल जी पर भगवद्गीता का प्रभाव पड़ा। वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक पं. मदन मोहन मालवीय के ‘समरसता’ के भाव से प्रभावित थे। दीनदयाल जी के लिये राष्ट्रधर्म सबसे बड़ा धर्म है। दीनदयाल जी का राष्ट्रत्व बोध एकांगी न होकर सम्पूर्ण समाज के लिये है। दीनदयाल जी प्रवासी, प्रचारक, संत और समाज वैज्ञानिक थे। वे मानते थे कि भारत का पुनरुद्भव सांस्कृतिक पुनरुद्भव से ही सम्भव है। दीनदयाल जी ने राष्ट्रवाद की सही परिकल्पना प्रस्तुत की। एकात्म मानव दर्शन से भारतीय समाज की विराटता की व्याख्या की। व्यष्टि, समष्टि में समरसता का बोध कराया। राष्ट्रीय जीवन के अनुकूल अर्थ रचना की बात की। वे पश्चिम की तरह राष्ट्रवाद में व्यक्ति के शोषण के विरुद्ध थे। भारतीय राष्ट्रवाद एकात्मक है। हम पृथ्वी को माता मानते हैं आकाश को पिता। पृथ्वी और आकाश के बीच ही हम सब पलते हैं, बड़े होते हैं। राष्ट्रीयता, मानवता, विश्वबन्धुत्व और शान्ति ही एकात्म मावन दर्शन का आधार है। दीनदयाल जी किसी प्रकार के नकल या किसी प्रकार तुष्टिकरण को भारत में ठीक नहीं मानते थे। उन्होंने मौलिक भारत की कल्पना की। दीनदयाल जी तन, मन, वचन कर्म और व्यवहार से एकात्म बोध के प्रतीक थे। दीनदयाल जी ने पुरुषार्थ चतुष्टय को एकात्मकता का आधार बताया। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से ही व्यष्टि का सर्वोत्कृष्ट विकास हो सकता है। भारत में विकास की एकांगी अवधारणा कभी नहीं रही। विकास का सन्दर्भ राष्ट्र और व्यष्टि के ध्येय से जुड़ा है। ‘सभी साथ चलें, सभी साथ बोले, सबके मन समान हो, किसी प्रकार विभेद न हो, सभी का कल्याण हो, यही दीनदयाल जी के चिंतन का ध्येय है। पर्यावरण की सुरक्षा से ही मानव की सुरक्षा सम्भव है। मानव की सुरक्षा ही राष्ट्र का विकास है। दीनदयाल जी ने जिस एकात्म दर्शन का प्रतिपादन किया उसका अर्थ सीधा है कि न कोई गरीब हो, न कोई दुःखी हो, सभी स्वस्थ हों, सभी शिक्षित हों, किसी को किसी प्रकार की पीड़ा न हो, सभी को समान अवसर हो, सभी राष्ट्रवादी हो। यह कल्पना ही ‘न्यू इंडिया’ का प्रारुप है। दीनदयाल जी ने इसका दार्शनिक आधार प्रस्तुत किया। दीनदयाल जी मानते हैं कि केवल विज्ञानवाद, भौतिकवाद और मानववाद से ही व्यष्टि को पूर्णता नहीं मिलती। व्यष्टि पूर्ण तभी होता है जब वह एकात्मवादी हो जाता है। यह तो मानना ही पड़ेगा कि ‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे’ जो सूक्ष्म में है वहीं विराट में है। सूक्ष्मता विराटता का हृदय है। दीनदयाल जी ने जिस अर्थायाम की बात की वह उनकी एकात्म अर्थनीति है। जो भारतीयों की बहुमुखी विकास पर आधारित है। विकास में समरुपता हो। विकास सृष्टिवादी हो। संगठित व्यक्तित्व, संगठित समाज, संगठित राष्ट्र दीनदयाल जी के चिंतन का लक्ष्य है। वे ऋषि तुल्य ंिचंतक और स्वयंसेवक थे। जीवन की श्रेष्ठता और उससे राष्ट्र की श्रेष्ठता ही उनका संकल्प है। दीनदयाल जी ने सभी की मंगल कामना की। अन्त्योदय का दर्शन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। दीनदयाल जी का सम्पूर्ण चिंतन सुविधा के लिये नहीं है। वह किसी पक्ष का प्रोत्साहन नहीं है। दीनदयाल का चिंतन व्यापक वैश्विक दृष्टि है। जिसका जन्म भारतीय ऋषियों की तपस्या से हुआ। उनके चिंतन में मानव जीवन का हर पहलू शामिल है। दीनदयाल जी का चिंतन सर्वकालिक है। वह जब तक भारत रहेगा अनन्त काल तक प्रासंगिक बना रहेगा। यही भारतीय समृद्धि का दर्शन है। जिससे महान भारतीय संस्कृति का निर्माण हुआ। दीनदयाल जी का दर्शन सभी को समाविष्ट करने वाला दर्शन है। हमें दीनदयाल जी के दर्शन को आत्मसात करना चाहिए।

दीनदयाल जी के दर्शन में पूर्णता की पात्रता है। संगठित व्यक्तित्व ही संगठित समाज का अवलम्ब होता है। संगठित आधार पर ही अपने यहां व्यक्ति से परिवार, समाज, राष्ट्र, मानवता और चराचर सृष्टि का विचार किया गया है। एकात्म मानव दर्शन इसी का नाम है। यह सम्पूर्ण अस्तित्व मूलगामी एवं सर्वव्यापी तत्व की खोज करने वाला दर्शन है। यह मानव चेतना के उत्तम विकास एवं स्वाभाविक अनुभूति का ही स्वरुप है। मनुष्य की चेतना का व्यक्ति से लेकर विश्व तक का विकास इस दर्शन का आधार है। एकात्म मानववाद मानव को समग्रता में देखने की दृष्टि है। इसका आयाम व्यक्ति से समष्टि और समष्टि से सृष्टि तथा सृष्टि से परमेष्टि तक विस्तृत है। विभिन्न इकाइयां एक दूसरे की पूरक है। व्यक्ति, परिवार, समुदाय, समाज, राष्ट्र और अन्तर्राष्ट्रीयता में कहीं कोई विरोध नहीं हैं।

दीनदयाल जी ने अपने चिन्तन में भारत की सनातन संस्कृति परम्परा को आधार बनाया। उन्होंने पूरी भारतीय चिन्तन परम्परा का आद्यतन मनोयोग से अध्ययन किया। उसकी गहराई को छुआ। उसकी सनातन व्यावहारिक बोध को समझने का प्रयास किया। उसका वैश्विक निहितार्थ समझा। पश्चिमवादी चिन्तन के नशे में धुत्त भारतीय मेधा में सनातन चिन्तन परम्परा जैसी नशा उतारने वाली गोली खिलाने का प्रयास किया। भारतीय सनातन संस्कृति को कूपमंडूक और अव्यावहारिक घोषित करने वाले पाश्चात्य चिन्तनधारा से आप्लावित भारतीय बुद्धिजीवियों को भारतीय सनातन सांस्कृतिक परम्परा का आइना दिखाया। शंकर वेदान्त, कौटिलीय अर्थशास्त्र, एवं स्वयं द्वारा निरूपित ‘एकात्म मानववाद’ एक ‘नव प्रस्थानस्त्रयी’ की स्थापना की। 20वीं शताब्दी में दीनदयाल ही एक मात्र चिन्तक है जिन्होंने ‘देशज’ चिन्तन की व्याख्या की और वे उसमें सफल भी रहे।

उनका सामाजिक विचार मुख्यतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा स्वीकृत समाजदर्शन ही हे। प्राचीन भारतीय समाज व्यवस्था का आधुनिकता के साथ विकास। पं. दीनदयाल उपाध्याय का सामाजिक चिन्तन एकात्म समाज व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था जैसी प्राचीन भारतीय व्यवस्थाओं का पोषण, लेकिन जातिवाद का विरोध, शिक्षा को आधारभूत माध्यम मानकर योग्य शिक्षानीति का नियमन, हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रति भारतीय राष्ट्रवादी दृष्टिकोण तथा राष्ट्रवाद की सम्यक् अवधारणा आदि के बारे में विस्तृत आयाम प्रदान करता है।

आज भारत को स्वतंत्र हुए 70 वर्ष हो गये है; लेकिन वर्तमान समय में भारतीय जनमानस एवं समाज के सामने बहुत सी समस्याएँ विद्यमान है जिनका निराकरण अभी नहीं हुआ है। इन समस्याओं का निराकरण पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के एकात्म मानव-दर्शन, राजनीतिक चिन्तन, आर्थिक चिन्तन एवं सामाजिक चिन्तन में मिलता है। पं. दीनदयाल उपाध्याय जी ने जो विचार उस समय की समस्याओं के निराकरण के लिए प्रस्तुत किए वह वर्तमान समय में भी प्रासंगिक हैं। पं. दीनदयाल उपाध्याय जी का उद्देश्य भारत की एकता को अटूट रखना था। जो राष्ट्र निर्माण के लिए सही रास्ता हैं।


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