Saturday , 23 September 2017
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Kalraj Mishra

राष्ट्रवादियों व स्वतंत्रता सेनानियों के विषय में पूर्वाग्रह छोड़कर पुनर्विचार की आवश्यकता

देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाडी ने हाल ही में उनके ब्लाग्स पर आधारित पुस्तक दृष्टिकोण में इस बात का आग्रह कि राष्ट्रवादियों के विषय में कांग्रेस अपने दृष्टिकोण पर पुनः विचार करे। इस सम्बन्ध में उन्होंने संसद के सेन्ट्रल हाल में विनायक दामोदर सावरकर के लगे चित्र व उनकी जयन्ती व पुण्य तिथि पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम का कांग्रेस द्वारा बहिष्कार का वर्णन किया।

संसद के सेन्ट्रल हाल में महात्मागांधी सहित लगभग 25 नेताओं के चित्र लगे हैं। इन नेताओं में सुभाषचन्द्र बोस, सी राजगोपालाचारी, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, पं0 मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, डा0 अम्बेडकर, राममनोहर लोहिया, मदनमोहन मालवीय, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद आदि के चित्र हैं। सेन्ट्रल हाल में जिन नेताओं के चित्र हैं उनकी जयन्ती और पुष्यतिथि पर लोकसभा सचिवालय कभी नहीं भूलता और लोकसभा की बुलेटिन में भी यह प्रकाशित किया जाता है। तथा सभी सांसदों को आमंत्रण भेजा जाता है।

फरवरी 2003 में जब सेन्ट्रल हाल में सावरकर का चित्र लगाया गया और तत्कालीन राष्ट्रपति डा0 अब्दुल कलाम द्वारा इसका अनावरण किया गया तब कांग्रेस पार्टी ने इस कार्यक्रम का बहिष्कार किया और तब से कांग्रेस पार्टी इस छायाचित्र से जुडे़ सभी कार्यक्रमों का बहिष्कार करती आ रही है। मैं अपने कांग्रेस के मित्रों को याद दिलाना चाहता हूँ कि 1966 में जब सावरकर ने अन्तिम सांस ली थी तक श्रीमती इन्दिरागांधी ने श्रंद्धाजलि देते हुए उन्हें भारत की महान विभूति बताया, जिनका नाम साहस और देशभक्ति का पर्याय बन चुका है। श्रीमती इन्दिरागांधी ने कहा कि व उत्कृष्ण श्रेणी के क्रान्तिकारी थे और अनगिनत लोगों ने उनसे प्रेरणा ली। तत्कालीन उपराष्ट्रपति डा0 जाकिर हुसैन ने अपने शोक संदेश में कहा-एक महान क्रान्तिकारी के रूप में उन्होंने अनेक युवाओं को मातृभूमि को स्वतंत्र कराने के लिए काम में लगने की प्रेरणा दी। ऐसे स्वतंत्रता सेनानी और क्रान्तिकारी की जयन्ती व पुण्यतिथि कार्यक्रमों का बहिष्कार करना वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व की तुष्टीकरण की राजनीति के प्रति तत्परता दिखाता है। जबकि स्वतंत्रता सेनानियांे की जयन्ती व पुण्यतिथि मनाने के विषय में देश की सबसे पुरानी व ऐतिहासिक राजनीतिक दल के लोगों को व्यापक दृष्टिकोण रखना चाहिए। व बगैर किसी पूर्वाग्रह के स्वतंत्रता सेनानियों के समारोहों में भाग लेना चाहिए।

इसी प्रकार 3 जनवरी की अपनी प्रेस कान्फ्रेन्स सम्बोधन में प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह अपनी तुष्टीकरण की राजनीति का पोषक होने का परिचय दिया जब उन्होंने कहा कि श्री नरेन्द्र मोदी का देश का प्रधानमंत्री बनना देश के लिए घातक होगा। देश के प्रधानमंत्री को यह जानकारी होनी चाहिए कि 2002 के जिन दंगो के लिए श्री नरेन्द्र मोदी पर सम्प्रदायिक होने के आरोप लगाये जाते हैं, सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में बनी ैश्रज् ने उन्हें क्लीन चिट दे दी थी और हाल ही में गुजरात की एक अदालत ने शिकायत कर्ताओं की अपील को खारिज कर श्री मोदी को क्लीन चिट दी है। हमारे देश में न्यायालय का सम्मान करने की परम्परा रही है परन्तु हमारे विद्वान प्रधानमंत्री ने इस परम्परा का भी निर्वाह नहीं किया।

अपनी सरकार के ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपांे की सफाई में डा0 सिंह ने अनूठा तर्क दिया, उन्होंने कहा कि जितने भी भ्रष्टाचार के केस हैं वे यू0पी0ए0आई0 के कार्यकाल के हैं और हमें वर्ष 2009 में देश की जनता ने डंदकंजम दे दिया है तो क्या प्रधानमंत्री जी यह चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के मामले चलाने हेतु कांग्रेस की ष्ठष् टीम ’आम आदमी पार्टी‘ की भांति त्ममितमदकनउ लिया जाना चाहिए। यदि अपनी सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बचाव में वे च्मवचसमे डंदकंजम का तर्क देते हैं तो वे कैसे भूल जाते हैं कि गुजरात की जनता ने 2002 के दुर्भाग्यपूर्ण दंगों के पश्चात एक नहीं दो-दो बार अपना जनमत दिया है। इस प्रकार नरेन्द्र भाई माननीय न्यायालय के द्वारा और प्रदेश की जनता द्वारा निर्दोष साबित किये जा चुके हैं। अब आवश्यकता है कांग्रेस समेत अपने को धर्म निरपेक्ष मानने वाले दलों के दृष्टिकोण में परिवर्तन की।

3 या 4 जनवरी को देश के सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारी ने ही टीवी चैनल के एक कार्यक्रम में कहा कि भाजपा एक साम्प्रदायिक पार्टी है और हमारी यह अवधारणा 1947 व 1947 से पूर्व से है। मैं यह बात बता दूँ कि 1947 में न तो मनीष तिवारी का ही जन्म हुआ था और न ही जनसंघ या भाजपा का। जनसंघ की स्थापना 1951 में और भाजपा की स्थापना 1980 में हुई। जनसंघ के संस्थापक डा0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी जो कि 1947 से 1950 तक पं0 जवाहर लाल नेहरू की सरकार में उद्योगमंत्री थे। केन्द्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा एक तथ्य विहीन बात कहना उनकी संकीर्ण सोच का परिचायक है।

पिछले माह प्रकाशित एक पत्रिका में छपे आलेख में प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी डा0 मौलाना अब्दुल कलाम आजाद के पौत्र फिरोजवक्त अहमद ने एक घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वे कांग्रेस के उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी से एक मित्र के साथ मिलने गये और उन्होंने पं0 नेहरू व मौलाना अब्दुल कलाम आजाद का एक चित्र श्री गांधी को भेंट किया। चित्र लेने के पश्चात श्री राहुल गांधी ने कहा कि पं0 नेहरू तो ठीक हैं परन्तु उनके साथ ये कौन हैं। यह कैसी त्रासदी है कि कांग्रेस जिस नेता को अपना भावी प्रधानमंत्री मानती है और वर्तमान प्रधानमंत्री कहते हैं कि मुझे श्री राहुल गांधी के अधीन काम करने में कोई गुरेज नहीं है वह नेता देश के महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अब्दुल कलाम आजाद को नहीं पहचानता या पहचानना नहीं चहता।

गुजरात के साम्प्रदायिक दंगो को न भुला पाने वाले विद्वान प्रधानमंत्री ने उ0प्र0 के मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों की पीड़ा के विषय में कुछ नहीं कहा। जहां पर उ0प्र0 सरकार ने शरणार्थी कैम्पों से पीड़ितों को भगाने हेतु बुलडोजर चलवा दिये गये और वहां के प्रमुख सचिव ने कैम्प में ठण्ड व कुपोषण से मर रहे बच्चों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए यह कह दिया कि ठण्ड से कोई नहीं मरता जबकि वहां पर 40 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी थी। और वहां के मुख्यमंत्री ने आरोपियों के खिलाफ मुकदमें बन्द करने के लिए जिला प्रशासन से राय मांगी थी।

अभी कुछ दिन पूर्व केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे ने सभी प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर यह अनुरोध किया है कि धर्म विशेष के व्यक्तियों के विरूद्ध अपराधिक मामलों में इनकी गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। यह कैसा दुर्भाग्य है कि जिस देश के संविधान में धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव निषेध है वहां पर धर्म विशेष के आधार पर किसी को संरक्षण देना या छूट देना संविधान की मूल भावना का अपमान है। हमारी संस्कृति ’’वसुधैव कुटुम्बकम‘‘ व सर्वधर्म सम्भाव के अनुरूप अनवरत चलती आ रही है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए।

अनेक शहीदों व सेनानियों की आहूति व लगभग डेढ सौ वर्षों के संघर्ष के पश्चात हमें आजादी मिली है और हम सब का यह कर्तव्य बनता है कि अपने स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान धर्मजाति की संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर करें। यही हमारे स्वतंत्रता सेनानियों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। संसद में चाहे सावरकर की पुण्यतिथि हो चाहे मौलाना अब्दुल कलाम की जयन्ती हो सभी दलों को इसमें भाग लेना चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि कांग्रेस सहित सभी दल अपने संकीर्ण दृष्टिकोण पर पुनः विचार करेंगे।

(कलराज मिश्र)

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